जशपुर । पत्थलगांव के राशन दुकानों पर इन दिनों "कल आना-परसों आना" का ऐसा राग छिड़ा है कि जनता अब इसे सरकारी दुकान कम और 'तारीख पे तारीख' वाली अदालत ज्यादा समझने लगी है। वार्ड वासियों के सब्र का बांध अब टूट चुका है। सुबह से शाम तक लाइन में खड़े रहने के बाद भी हाथ में राशन की जगह सिर्फ आश्वासन की पुड़िया आ रही है।
अजब राशन, गजब खेल: चना है तो शक्कर नदारद!
दुकानों का आलम यह है कि यहाँ राशन का मेल-जोल किसी पुरानी फिल्म के बिछड़े भाइयों जैसा है। कभी चना मिल रहा है तो शक्कर गायब है, और जब शक्कर आती है तो चने का अता-पता नहीं होता। आम जनता का सवाल है कि क्या प्रशासन चाहता है कि हम एक दिन फीकी चाय पिएं और दूसरे दिन बिना शक्कर के चने चबाएं? ऊपर से केवाईसी और डेटा अपडेट के नाम पर सर्वर की सुस्ती ने आग में घी डालने का काम किया है।
जनता का बढ़ता आक्रोश: जिम्मेदार कौन?
वार्डों में रहने वाले बुजुर्ग और महिलाएं दिन भर काम-धंधा छोड़कर दुकान के सामने खड़े रहते हैं, पर आखिर में उन्हें खाली हाथ घर लौटना पड़ता है। परेशान लोगों का अब सीधे तौर पर कहना है कि शासन और प्रशासन की लापरवाही ने गरीबों के निवाले पर संकट खड़ा कर दिया है।
क्या कहते हैं नियम?
नियमों के मुताबिक, राशन दुकानों को तय समय पर खुलना चाहिए और सभी सामग्री का स्टॉक बोर्ड पर प्रदर्शित होना चाहिए। लेकिन पत्थलगांव की जमीनी हकीकत इन कागजी दावों से कोसों दूर है। स्थानीय लोगों ने अब चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही राशन वितरण की यह 'लुका-छिपी' बंद नहीं हुई, तो वे उग्र प्रदर्शन के लिए मजबूर होंगे।
