जशपुर/पत्थलगांव । छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले से इन दिनों जो खबरें आ रही हैं, वे लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं हैं। एक तरफ सूबे में भाजपा की सरकार 'सुशासन' का दावा कर रही है, वहीं दूसरी तरफ जशपुर में सच दिखाने वाले पत्रकारों पर हमले और आम जनता की अनसुनी चीखें प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं।
1. सच दिखाने की सजा: दबंगों का कहर और पुलिस की चुप्पी
जशपुर में पत्रकारों के बीच एक अनजाना डर घर कर गया है। आरोप है कि जब भी कोई पत्रकार जिले में व्याप्त भ्रष्टाचार या भू-माफियाओं के खिलाफ आवाज उठाता है, तो उसे दबंगों द्वारा डराया-धमकाया या पीटा जाता है। हालिया घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यहाँ कलम की ताकत पर लाठी भारी पड़ रही है। विडंबना देखिए कि मारपीट की शिकायत करने के बावजूद पुलिसिया कार्रवाई "कछुआ चाल" से भी धीमी है, जिससे अपराधियों के हौसले बुलंद हैं।
2. कप्तान की कप्तानी पर सवाल: ढीली पकड़ या मिलीभगत?
जिले के नए कप्तान (SP) की कार्यशैली अब जनता के निशाने पर है। सवाल उठ रहा है कि क्या नए कप्तान की कप्तानी ढीली पड़ गई है या फिर पर्दे के पीछे माफिया और गुंडों को संरक्षण मिल रहा है? हाल ही में DIG-SSP डॉ. लाल उमेद सिंह ने कानून-व्यवस्था की समीक्षा की और लंबित मामलों के निपटारे के निर्देश दिए, लेकिन जमीनी हकीकत इससे कोसों दूर नजर आती है। यदि पत्रकार सुरक्षित नहीं हैं, तो उस जिले की आम जनता की बिसात ही क्या है?
3. आम जनता का हाल: न्याय की उम्मीद में भटकते लोग
जब रक्षक ही मौन हो जाएं, तो भक्षक बेखौफ हो जाते हैं। पत्रकारों के साथ हो रहे अन्याय को देखकर आम जनता में यह संदेश जा रहा है कि यदि "चौथे स्तंभ" की सुनवाई नहीं हो रही, तो उनकी शिकायतों पर FIR दर्ज होना तो दूर, जांच तक नहीं होगी। जशपुर में शिकायत निवारण शिविरों में भारी संख्या में आवेदन पहुंच रहे हैं, जो सीधे तौर पर पुलिस और प्रशासन की विफलता को दर्शाते हैं।
4 . क्या माफिया राज की वापसी हो रही है?
जशपुर की शांत फिजाओं में अब डर का जहर घुलने लगा है। अवैध खनन से लेकर ज़मीन कब्जों तक, माफियाओं का हस्तक्षेप बढ़ता जा रहा है। पत्रकारों का कहना है कि पुलिस अपराधियों को पकड़ने के बजाय शिकायतकर्ताओं को ही कानूनी पेचीदगियों में उलझाने का प्रयास करती है, जिससे सच दिखाने का साहस दम तोड़ रहा है।
अगर सरकार और प्रशासन ने समय रहते जशपुर की इस बिगड़ती कानून-व्यवस्था पर लगाम नहीं कसी, तो वह दिन दूर नहीं जब जिले से निष्पक्ष पत्रकारिता पूरी तरह गायब हो जाएगी। मुख्यमंत्री और गृहमंत्री को इस मामले में हस्तक्षेप कर पत्रकारों को सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए और दोषियों पर सख्त कार्रवाई का उदाहरण पेश करना चाहिए।
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