एसडीएम के आदेश से पहले ही ऑनलाइन रिकॉर्ड में बदलाव! 2.023 हेक्टेयर जमीन पर मुआवजे के खेल की आशंका

 

धरमजयगढ़ - रायगढ़ जिले के धरमजयगढ़ क्षेत्र में प्रस्तावित कोल ब्लॉक के भू-अर्जन क्षेत्र से जुड़ी जमीन के राजस्व रिकॉर्ड में ऐसा मामला सामने आया है, जिसने पूरे राजस्व तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सरकारी रिकॉर्ड में लंबे समय तक खाली दर्ज रही जमीन को वर्ष 2017 में अचानक एक निजी व्यक्ति के नाम दर्ज कर ‘शासकीय पट्टादार’ बताया गया और इसके बाद उसी जमीन को पूर्ण भू-स्वामी हक में बदलने की कोशिश की गई। लेकिन एसडीएम न्यायालय में मामला पहुंचते ही कथित पट्टे की बुनियाद ही सवालों के घेरे में आ गई।


मामला धरमजयगढ़ कॉलोनी स्थित खसरा नंबर 356/1, रकबा 2.0230 हेक्टेयर का है। पुराने अधिकार अभिलेख में यह भूमि खाली प्लॉट के रूप में दर्ज बताई गई है। वर्ष 2017 में भू-स्वामी पट्टा आवंटन की प्रक्रिया के दौरान इस भूमि को सागर सरकार पिता मादर सरकार के नाम दर्ज किया गया और कैफियत में ‘शासकीय पट्टादार’ का उल्लेख कर दिया गया। इसके बाद इसी पट्टे को पूर्ण भू-स्वामी अधिकार में परिवर्तित कराने के लिए एसडीएम न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत किया गया।


सबसे बड़ा पेंच यहीं सामने आया। आवेदन में जमीन मिलने का समय लगभग वर्ष 1980 बताया गया, लेकिन कथित पट्टे से संबंधित ऐसा कोई वैध सरकारी दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया जा सका, जिससे यह साबित हो सके कि जमीन वास्तव में संबंधित व्यक्ति को कब, किस आदेश से और किस प्रक्रिया के तहत आवंटित की गई थी।


एसडीएम न्यायालय में नहीं टिक सकी पट्टे की कहानी

मामले की सुनवाई के दौरान संबंधित पक्ष कथित शासकीय पट्टे के समर्थन में आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सका। यही वजह रही कि एसडीएम न्यायालय ने भू-स्वामी दर्ज किए जाने के आवेदन को निरस्त कर दिया।


अब सबसे गंभीर सवाल यह है कि जब कथित पट्टे का मूल सरकारी दस्तावेज ही उपलब्ध नहीं है, तो वर्ष 2017 में राजस्व रिकॉर्ड में इस जमीन को निजी व्यक्ति के नाम दर्ज करने का आधार क्या था?

और यदि आधार था, तो उसका दस्तावेजी रिकॉर्ड कहां है?

यहीं से यह पूरा मामला महज राजस्व रिकॉर्ड की त्रुटि न रहकर सरकारी जमीन के निजीकरण की संभावित कोशिश के रूप में गंभीर जांच का विषय बन जाता है।

कोर्ट का आदेश आने से पहले ऑनलाइन रिकॉर्ड कैसे बदल गया?

मामले का सबसे सनसनीखेज पहलू वर्तमान ऑनलाइन राजस्व रिकॉर्ड से सामने आता है। उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार वर्तमान हल्का पटवारी हरीश कुमार पैंकरा के कार्यकाल में एसडीएम न्यायालय के आदेश से पहले ही संबंधित खसरा की कैफियत में परिवर्तन दिखाई देता है और अब रिकॉर्ड में भू-स्वामी संबंधी प्रविष्टि दर्ज नजर आती है।

यानी एक तरफ एसडीएम न्यायालय में भू-स्वामी अधिकार का दावा दस्तावेजों के अभाव में खारिज हो जाता है, दूसरी तरफ न्यायालयीन निर्णय से पहले ही ऑनलाइन राजस्व रिकॉर्ड में स्थिति बदलती दिखाई देती है।

यह सामान्य रिकॉर्ड सुधार था या किसी प्रक्रिया के तहत किया गया परिवर्तन—इसकी जांच अब बेहद जरूरी हो गई है।

यदि न्यायालय में किसी दावे को साबित करने के लिए दस्तावेज उपलब्ध नहीं थे, तो फिर ऑनलाइन रिकॉर्ड में भू-स्वामी संबंधी प्रविष्टि किस आधार पर और किस अधिकारी की अनुमति से दर्ज हुई, यह जांच का केंद्रीय बिंदु बन गया है।

वर्ष 2017 की प्रविष्टि भी घेरे में

मामला केवल वर्तमान रिकॉर्ड तक सीमित नहीं है। वर्ष 2017 में तत्कालीन हल्का पटवारी बाल मुकुंद सारथी के कार्यकाल में राजस्व रिकॉर्ड में कथित पट्टे का विवरण दर्ज किए जाने की बात सामने आ रही है, लेकिन उपलब्ध जानकारी के अनुसार उस प्रविष्टि में पट्टे से संबंधित खसरा नंबर तक दर्ज नहीं था।

ऐसे में सवाल यह उठता है कि जिस जमीन का खसरा नंबर ही पट्टा संबंधी विवरण में स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं था, उसे बाद में खसरा नंबर 356/1 से जोड़ने का आधार क्या था?

क्या वर्ष 2017 की प्रविष्टि किसी मूल सरकारी आदेश पर आधारित थी या केवल रिकॉर्ड में की गई एक प्रविष्टि के आधार पर आगे की प्रक्रिया बढ़ाई गई?

इन बिंदुओं की जांच के बिना इस जमीन की वास्तविक स्थिति स्पष्ट होना मुश्किल है।

कोल ब्लॉक के लिए प्रस्तावित जमीन, इसलिए मामला और गंभीर

यह पूरा मामला इसलिए भी अत्यंत संवेदनशील है क्योंकि संबंधित भूमि प्रस्तावित कोल ब्लॉक क्षेत्र में भू-अर्जन से जुड़ी बताई जा रही है। यदि किसी सरकारी या पुनर्वास संबंधी भूमि का स्वामित्व संदिग्ध दस्तावेजों अथवा विवादित राजस्व प्रविष्टियों के आधार पर निजी नाम पर स्थापित हो जाता है, तो भविष्य में भू-अर्जन के दौरान मुआवजे का दावा खड़ा हो सकता है।

यही वह बिंदु है जहां यह मामला एक सामान्य पट्टा विवाद से निकलकर संभावित बड़े वित्तीय हितों वाले मामले में बदल जाता है।

2.0230 हेक्टेयर जमीन पर यदि स्वामित्व का दावा मजबूत हो जाता है और भविष्य में भू-अर्जन होता है, तो संबंधित व्यक्ति को मिलने वाले संभावित मुआवजे का आधार यही राजस्व रिकॉर्ड बन सकता है। इसलिए रिकॉर्ड में की गई प्रत्येक प्रविष्टि और उसके पीछे मौजूद दस्तावेज की जांच बेहद महत्वपूर्ण है।

राजस्व मामले की भूमिका की उच्चस्तरीय जांच जरूरी

पूरे प्रकरण में वर्ष 2017 की प्रविष्टि से लेकर वर्तमान ऑनलाइन रिकॉर्ड में हुए परिवर्तन तक हर कड़ी की जांच आवश्यक है। तत्कालीन हल्का पटवारी बाल मुकुंद सारथी के कार्यकाल में दर्ज प्रविष्टि, कथित वर्ष 1980 के पट्टे का अस्तित्व, उसके मूल दस्तावेज, पट्टा आवंटन की फाइल, वर्ष 2017 की कार्रवाई और वर्तमान हल्का पटवारी हरीश कुमार पैंकरा के कार्यकाल में ऑनलाइन रिकॉर्ड में हुए परिवर्तन—इन सभी को एक साथ जांच के दायरे में लाना होगा।

विशेष रूप से यह जांच जरूरी है कि एसडीएम न्यायालय के आदेश से पहले ऑनलाइन रिकॉर्ड में परिवर्तन किस आधार पर हुआ और उस परिवर्तन के लिए कौन-कौन से दस्तावेज अथवा आदेश उपयोग में लिए गए।

यदि कथित पट्टे का मूल दस्तावेज सरकारी रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं है और न्यायालय में भी उसे प्रमाणित करने वाला दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया जा सका, तो फिर वर्ष 2017 में हुई प्रविष्टि की वैधता स्वतः गंभीर जांच का विषय बन जाती है।

अब जांच सिर्फ जमीन की नहीं, रिकॉर्ड तैयार करने की प्रक्रिया की भी होनी चाहिए

यह मामला बताता है कि सरकारी जमीन के रिकॉर्ड में एक छोटी सी प्रविष्टि भविष्य में कितनी बड़ी आर्थिक दावेदारी का आधार बन सकती है। इसलिए इस प्रकरण में केवल वर्तमान प्रविष्टि की जांच पर्याप्त नहीं होगी। मूल नस्तियां, पट्टा आवंटन रजिस्टर, आदेश पत्र, नामांतरण अभिलेख, खसरा-पंचसाला, कैफियत, ऑनलाइन रिकॉर्ड में हुए बदलाव का डिजिटल लॉग और संबंधित अधिकारियों की कार्रवाई की जांच आवश्यक है।

प्रस्तावित कोल ब्लॉक क्षेत्र से जुड़ी 2.0230 हेक्टेयर जमीन पर उठे इन सवालों का जवाब अब राजस्व विभाग को रिकॉर्ड के साथ देना होगा। क्योंकि मामला सिर्फ यह नहीं है कि जमीन किसके नाम है—मामला यह है कि सरकारी रिकॉर्ड में यह नाम आया कैसे, किस आधार पर आया और न्यायालयीन आदेश के ठीक पहले रिकॉर्ड की स्थिति बदली कैसे।

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