बगीचा/जशपुर:
बगीचा के सन्ना क्षेत्र में बीती रात राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की प्रतिमा को निशाना बनाकर तोड़ दिया गया। अज्ञात उपद्रवियों ने बापू की मूर्ति पर अपनी वीरगाथा लिखते हुए यह साबित कर दिया कि एक सीमेंट और प्लास्टर की मूर्ति से आज भी कुछ बुजदिलों की रूह कांपती है।
घटना की खबर फैलते ही इलाके में तनाव और आक्रोश का माहौल है। पुलिस-प्रशासन हमेशा की तरह "जांच जारी है" और "दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा" वाला पुराना टेप बजा रहा है।
अहिंसा के आगे फिर हारा 'कायरता का हथौड़ा'
महात्मा गांधी ने लाठी के बल पर ब्रिटिश हुकूमत उखाड़ फेंकी थी, लेकिन सन्ना के इन 'शूरवीरों' ने अंधेरे का फायदा उठाकर एक बेज़ुबान मूर्ति पर अपना पराक्रम दिखाया है। जरा सोचिए, जिस इंसान ने पूरी जिंदगी अहिंसा का पाठ पढ़ाया, उसकी मूर्ति तोड़ने के लिए भी उपद्रवियों को हथौड़े और अंधेरे का सहारा लेना पड़ा!
यह घटना सिर्फ एक मूर्ति का टूटना नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि गांधी के विचार आज भी कुछ लोगों के दिमाग में इतनी जोर से चुभते हैं कि वे रात के अंधेरे में पत्थर तोड़ने को अपनी बड़ी कामयाबी मान बैठते हैं।
व्यंग्य: मूर्ति तो तोड़ दी, जरा विचार तोड़कर दिखाओ!
गांधी जी की मूर्ति तोड़ने वाले महानुभावों को शायद लगता होगा कि मूर्ति का सिर या हाथ खंडित कर देने से बापू का वजूद खत्म हो जाएगा।
एक सुझाव उपद्रवियों के लिए: मूर्ति तोड़ना तो बहुत आसान और कायरतापूर्ण काम है। अगर वाकई दम है, तो गांधी के 'सत्य', 'अहिंसा' और 'सद्भाव' के विचारों को तोड़कर दिखाइए।
बधाई हो समाज को: हम उस दौर में जी रहे हैं जहां जिंदा इंसान को रोजगार और सुरक्षा मिले न मिले, लेकिन लोहे और पत्थर के पुतलों से हमारी "महान राष्ट्रीय भावनाएं" आहत भी होती हैं और तुष्ट भी होती हैं।
पुलिस विभाग को राहत: चलिए, कम से कम प्रशासन को दो-चार दिन मुस्तैद दिखने, शांति समिति की बैठकें करने और चाय-समोसे के साथ "कड़ी निंदा" करने का एक और मौका मिल गया।
बड़ा सवाल: नफरत का यह जहर कब तक?
सन्ना की यह घटना कोई अकेली घटना नहीं है। यह उस नफरती सोच का नतीजा है जो पिछले कुछ समय से समाज की जड़ों में घोली जा रही है। किसी की मूर्ति पर हमला करना असल में हमारी लोकतांत्रिक सोच और सामाजिक ताने-बाने पर हमला है।
अगर पुलिस प्रशासन वाकई इस मामले में गंभीर है, तो सिर्फ केस दर्ज करने का औपचारिक खेल न खेले। उन कायरों को ढूंढकर बेनकाब करे, जिन्होंने रात के अंधेरे में अपनी घटिया मानसिकता का प्रदर्शन किया है।
बापू की मूर्ति तो कल फिर नई बन जाएगी, लेकिन समाज के दिमाग में जो नफरत का दरार आया है, उसे मरम्मत करने में सदियां लग जाएंगी।
