पत्थलगांव। "माता कुमाता नहीं होती..."—लीजिए, इस सदियों पुरानी घिसी-पिटी कहावत पर पत्थलगांव के तिलडेगा (शांतिपारा) से एक करारा तमाचा जड़ा गया है! सूत्रों की मानें तो शांतिपारा की एक ममतामयी माँ ने अपने ही कलेजे के टुकड़े का सौदा कर डाला। रेट कार्ड भी कोई खास महंगा नहीं था—महज 2 लाख 50 हजार रुपये! जी हां, ढाई लाख में एक नवजात की जिंदगी का सौदा पक्का हो गया और ममता नोटों की गड्डी के नीचे दबकर तड़पती रह गई।
अब सवाल यह उठता है कि क्या पत्थलगांव में बच्चे बेचना कोई नया 'कुटीर उद्योग' बन चुका है?
इतिहास गवाह है, यह कोई पहली बार नहीं हुआ। जरा याद कीजिए बाजारपारा की उस महिला को, जिसने अपने दूधपीते बच्चे को बीच चौराहे बेच डाला था। उस समय भी शहर में खूब हल्ला-गुल्ला हुआ था, चाय की टपरियों से लेकर गलियारों तक चर्चा का बाजार गरम था, लेकिन अंजाम क्या हुआ? ढाक के वही तीन पात!
पूंजीपतियों का नया शौक या कानून का खौफ खत्म?
आखिर ये रईसजादे और पूंजीपति बच्चे खरीद क्यों रहे हैं? क्या बाजार में अब इंसानी रिश्ते भी ‘रेडीमेड’ बिकने लगे हैं? या फिर शहर के कुछ धनकुबेरों को लगता है कि दौलत के जोर पर वे किसी की औलाद भी अपनी तिजोरी में सजा सकते हैं?
और सबसे बड़ा तमाशा तो हमारा 'जासूस और मुस्तैद' शासन-प्रशासन है!
पत्थलगांव में एक के बाद एक बच्चे नीलाम हो रहे हैं, और प्रशासन इस कदर गहरी नींद में सो रहा है मानो कुंभकर्ण ने यहीं आकर समाधि ले ली हो।
* क्या प्रशासन को वास्तव में कोई खबर नहीं होती?
* या फिर 'ढाई लाख' की गूंज में साहिबों के कान के पर्दे सुन्न हो जाते हैं?
* यह चुप्पी लाचारी है, या फिर साठगांठ का सन्नाटा?
फिलहाल, पूरा शहर सांस रोके बैठा है। आरोपी महिला के पकड़े जाने के बाद ही इस गंदे धंधे की परतें खुलेंगी और कई 'सफेदपोश' खरीदारों के चेहरे से नकाब उतरेगा। तब तक के लिए, पत्थलगांव की जनता बस इतना ही मनाए कि कल को कोई और ममता ढाई लाख के लालच में नीलाम न हो जाए!
