अब सस्ते सौदे नहीं: कृषि उपज मंडी से किसान को मिलेगा पूरा दाम

पत्थलगांव :- मदनपुर क्षेत्र में सरकार की 7.50 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित कृषि उपज मंडी अब पूरी तरह ज़मीनी स्तर पर उतर चुकी है। इस मंडी का वर्चुअल उद्घाटन पहले ही हो चुका था, लेकिन विभिन्न कारणों से इसका संचालन शुरू नहीं हो पाया था। अब 26 जनवरी से मंडी में विधिवत रूप से कामकाज शुरू हो जाने से जशपुर जिले के किसानों और व्यापारियों—दोनों को एक साझा, संगठित और सरकारी प्लेटफॉर्म मिल गया है।

छत्तीसगढ़ बनने के बाद भी क्यों नहीं बदली व्यवस्था

मध्यप्रदेश से अलग होकर छत्तीसगढ़ राज्य बने कई वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन जशपुर जिले में टमाटर व अन्य सब्जियों की खरीद-बिक्री की व्यवस्था में कोई बड़ा बदलाव नहीं आ पाया था। दशकों से यहां हाट-बाजार आधारित प्रणाली चलती रही, जहां किसान अपनी उपज गांव या आसपास लगने वाले साप्ताहिक हाट में ही बेचने को मजबूर थे।


इस व्यवस्था में व्यापारी किसानों के घर के पास या हाट-बाजार में पहुंचकर टमाटर और सब्जियां बहुत कम दामों पर खरीद लेते थे। किसान के पास न तो फसल रोककर रखने की सुविधा थी, न बाजार भाव की पूरी जानकारी और न ही किसी तरह की सौदेबाजी की ताकत।

हाट-बाजार में किसानों की मजबूरी

हाट-बाजार में बेचते समय किसान:

सही तौल की गारंटी से वंचित रहते थे

एक या दो व्यापारियों के सामने ही बेचने को मजबूर होते थे

बाजार के वास्तविक दाम से अनजान रहते थे

तुरंत नकद की जरूरत के कारण कम कीमत पर फसल बेच देते थे

इसका सीधा असर किसानों की आमदनी पर पड़ता था, जबकि वही सब्जियां आगे चलकर बड़े बाजारों में कहीं अधिक दाम पर बिकती थीं।

व्यापारियों की भी अपनी समस्याएं

हाट-बाजार की व्यवस्था में केवल किसान ही नहीं, व्यापारी भी कई दिक्कतों का सामना करते थे। व्यापारियों को:

अलग-अलग गांवों में जाकर खरीद करनी पड़ती थी

उपज की गुणवत्ता और मात्रा अनिश्चित रहती थी

तौल और भुगतान को लेकर विवाद की स्थिति बनती थी

कोई स्थायी और सुरक्षित व्यापारिक ढांचा उपलब्ध नहीं था

यानी हाट-बाजार व्यवस्था न किसान के लिए पूरी तरह लाभकारी थी, न व्यापारी के लिए स्थिर।

कृषि उपज मंडी से क्या बदला

अब कृषि उपज मंडी पाथलगांव–मदनपुर के संचालन से वर्षों पुरानी इस अव्यवस्थित प्रणाली में बदलाव की शुरुआत हुई है। मंडी में किसान अपनी उपज लाकर:

पंजीकरण कराते हैं

सरकारी तौल कांटे पर सही वजन पाते हैं

खुली नीलामी के जरिए कई व्यापारियों के बीच प्रतिस्पर्धा में फसल बेचते हैं

बिक्री और भुगतान का लिखित रिकॉर्ड प्राप्त करते हैं

इससे किसान को न केवल बेहतर दाम मिल रहा है, बल्कि उसे यह भरोसा भी मिल रहा है कि उसकी उपज नियम और पारदर्शिता के तहत बेची जा रही है।

मंडी से किसानों को सीधे फायदे

कृषि उपज मंडी से किसानों को:

उपज का उचित और प्रतिस्पर्धी मूल्य

बिचौलियों से मुक्ति

बाजार भाव की सही जानकारी

समय और परिवहन खर्च की बचत

सरकारी निगरानी और सुरक्षा

जैसे कई लाभ मिल रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान नियमित रूप से मंडी से जुड़ते हैं, तो उनकी आय में स्थायी बढ़ोतरी संभव है।

व्यापारियों के लिए भी फायदेमंद साबित हो रही मंडी

यह मंडी केवल किसानों के लिए ही नहीं, बल्कि व्यापारियों के लिए भी एक सुव्यवस्थित प्लेटफॉर्म है। मंडी में पंजीकृत व्यापारियों को:

एक ही स्थान पर पर्याप्त मात्रा में उपज उपलब्ध हो रही है

गुणवत्ता, तौल और कीमत में पारदर्शिता मिल रही है

वैध रसीद और रिकॉर्ड के कारण व्यापार में भरोसा बढ़ रहा है

गांव-गांव जाकर खरीद करने का झंझट खत्म हो रहा है

समय, श्रम और लागत—तीनों की बचत हो रही है

इससे व्यापारी भी अब लंबे समय की व्यापारिक योजना बना पा रहे हैं।

किसान–व्यापारी दोनों के लिए साझा मंच

कृषि उपज मंडी पाथलगांव–मदनपुर किसानों और व्यापारियों के बीच सीधा और भरोसेमंद सेतु बनकर उभर रही है। जहां किसान को उसकी मेहनत का सही मूल्य मिल रहा है, वहीं व्यापारी को स्थिर, सुरक्षित और संगठित व्यापारिक माहौल मिल रहा है।

समझ और सहभागिता की जरूरत

फिलहाल कुछ किसान और व्यापारी मंडी व्यवस्था को पूरी तरह समझ नहीं पा रहे हैं, लेकिन कृषि विभाग और मंडी प्रशासन द्वारा लगातार जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। अधिकारियों का कहना है कि मंडी व्यवस्था अपनाने से जशपुर जिले में सब्जी उत्पादन, बिक्री और आय—तीनों में बड़ा बदलाव आएगा।

प्रशासन ने किसानों और व्यापारियों से अपील की है कि वे हाट-बाजार की पुरानी और नुकसानदेह व्यवस्था से आगे बढ़ते हुए कृषि उपज मंडी प्रणाली को अपनाएं, ताकि सरकार की 7.50 करोड़ रुपये की यह योजना वास्तव में किसानों और व्यापारियों के जीवन में बदलाव ला सके।

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