पत्थलगांव में 'जादूगर' तहसीलदार का 'विदाई शो': कुर्सी छूटी पर कलम नहीं रुकी, कार्यमुक्त होने के बाद कर डालीं 33 रजिस्ट्रियां!

 

पत्थलगांव (जशपुर)।

कहते हैं सरकारी तंत्र में 'साहब' जब तक कुर्सी पर बैठे हैं, तब तक ही उनका रूतबा होता है। लेकिन पत्थलगांव के पूर्व तहसीलदार श्रीमान प्रांजल मिश्रा जी ने इस धारणा को अपनी 'जादुई' शक्तियों से झुठला दिया है। जैसा कि संलग्न दस्तावेज़ में साफ देखा जा सकता है, साहब को 09/04/2026 को अपरान्ह पश्चात् बगीचा तहसील के लिए कार्यमुक्त (Relieve) कर दिया गया था। लेकिन ट्विस्ट यहीं से शुरू होता है!

आम अफसर बोरिया-बिस्तर समेटते हैं, मगर हमारे 'सुपरमैन' तहसीलदार साहब ने कार्यमुक्त होने के बाद, यानी 9 तारीख से लेकर 13 तारीख के बीच ऐसी 'अदृश्य' कलम चलाई कि 33 रजिस्ट्रियां धड़ाधड़ निपटा दीं! बिना कुर्सी के इतनी तेज रफ्तार? इसे प्रशासनिक चमत्कार कहें या विदाई की बेला में उपजी कोई खास 'मजबूरी'?

🎩 खसरा नंबर 333/1 का 'महा-जादू': आदिवासी जमीन को चुटकियों में बनाया सामान्य!

इस पूरे विदाई शो का सबसे बड़ा आकर्षण रही रायगढ़ रोड की विवादित जमीन (खसरा नंबर 333/1)। यह वही जमीन है जिसके 'मायाजाल' में फंसकर पूर्व पटवारी मैडम भगत को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा था और वे बर्खास्त हो गईं।

नियमों को ठेंगा: जिस जमीन पर पैर रखते ही पटवारी की नौकरी चली गई, वहां तहसीलदार साहब ने 'खतरों के खिलाड़ी' बनकर एंट्री मारी।

इतिहास ही बदल दिया: रिकॉर्ड बताते हैं कि यह जमीन साल 1956 में एक आदिवासी के नाम पर दर्ज थी। लेकिन साहब के पास शायद कोई ऐसी 'प्रशासनिक फेविक्विक' थी जिससे उन्होंने चुटकियों में सारे विवादों को दरकिनार किया और इस आदिवासी जमीन को 'सामान्य' श्रेणी में तब्दील कर दिया।

टुकड़े-टुकड़े गैंग की तरह बांटी जमीन: रहमोकरम की हद तो देखिए, इस विवादित जमीन को सिर्फ बदला ही नहीं, बल्कि इसे 333/1, 333/5 और 333/8 जैसे कई खसरा नंबरों के टुकड़ों में बांटकर इसकी रजिस्ट्री भी कर दी गई।

🤔 आखिर विदाई के बाद ऐसी कौन सी 'चूल' मची थी साहब को?

अब जनता और कानून के रखवाले यह सोचकर सिर धुन रहे हैं कि जब 9 अप्रैल 2026 को अनुविभागीय अधिकारी (रा0) पत्थलगांव के आदेश क्रमांक 416 से साहब बगीचा के लिए रवाना हो चुके थे, तो ऐसी कौन सी 'राष्ट्रीय जिम्मेदारी' निभाने की चूल मची थी कि वे पत्थलगांव के भू-माफियाओं और विवादित जमीनों का उद्धार करने में जुटे रहे?

बड़ा सवाल: क्या कार्यमुक्त होने के बाद भी किसी अधिकारी की कलम में इतनी ताकत होती है? या फिर इस पूरे खेल के पीछे किसी बड़े 'रिमोट कंट्रोल' का हाथ है? क्या साहब को किसी उच्च अधिकारी या कलेक्टर महोदय का अभेद्य 'संरक्षण' प्राप्त है, जो वे बिना किसी डर या भय के नियमों की धज्जियां उड़ाते रहे?

⚖️ मामला पहुंचा मुख्यमंत्री और राज्यपाल के दरबार में, अब 'एक्शन' का इंतजार

इस जादुई खेल की गूंज अब रायपुर और राजभवन तक पहुंच चुकी है। 9 से 13 तारीख के बीच हुई इन सभी 33 'अवैध' रजिस्ट्रियों को खारिज करने और इस काले कारनामे की जांच के लिए मुख्यमंत्री और महामहिम राज्यपाल महोदय को सारे पुख्ता दस्तावेजों के साथ लिखित शिकायत भेज दी गई है।

दस्तावेज़ चीख-चीखकर साहब की कार्यमुक्ति की तारीख गवाही दे रहा है, और रजिस्ट्रार ऑफिस के आंकड़े उनकी 'अति-सक्रियता' के। अब देखना यह है कि शासन के इस 'जादूगर' पर प्रशासन की हंटर चलती है या फिर इस जादू को 'मास्टरस्ट्रोक' मानकर फाइल दबा दी जाती है!

जनता की नजरें टिकी हैं— देखते हैं, आगे-आगे होता है क्या!



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