पहली बारिश में बह गया विकास! लैलूंगा में घटिया निर्माण पर उठे बड़े सवाल

 

रायगढ़। एक तरफ प्रदेश की सरकार 'सुशासन' और 'भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस' का ढिंढोरा पीट रही है, वहीं दूसरी ओर रायगढ़ जिले का जनपद पंचायत लैलूंगा भ्रष्टाचार और घटिया निर्माण का पर्याय बन चुका है। कागजों पर चमकते विकास की जमीनी हकीकत यह है कि लाखों रुपये की लागत से बनी सड़कें, नालियां और गाइडवाल बनने के कुछ ही महीनों (यहाँ तक कि कुछ हफ्तों) के भीतर ताश के पत्तों की तरह ढह रही हैं।

जनता के टैक्स के पैसों की इस खुली बर्बादी ने न केवल निर्माण एजेंसियों के हौसले बुलंद कर दिए हैं, बल्कि जनपद पंचायत के जिम्मेदार अधिकारियों की मंशा पर भी कई तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं।

बदहाली की दास्तान : जहाँ देखिए, वहीं से उखड़ रहा 'विकास' - ग्राम पंचायतों से आ रही तस्वीरें आरईएस विभाग और जनपद पंचायत की तकनीकी मॉनिटरिंग की पोल खोलने के लिए काफी हैं:

 ग्राम जामबाहर : हाल ही में लाखों की लागत से बनी सीमेंट नाली पहली ही बरसात/उपयोग में जगह-जगह से चटक कर टूट चुकी है। दीवारों का कंक्रीट उखड़ चुका है और घटिया सामग्री साफ नजर आ रही है।

 ग्राम सागरपाली : लाखों की लागत से खड़ी की गई 'गाइडवाल' निर्माण के महज एक साल के भीतर ही भरभराकर गिर गई।

 ग्राम बेसकीमुड़ा : यहाँ बनी सीमेंट कंक्रीट (CC) सड़क की गिट्टियां अभी से बाहर आने लगी हैं और किनारे पूरी तरह टूट चुके हैं।

मानक M-20 का, काम 'बालू-गिट्टी' के ढेर का! - तकनीकी मानकों की बात करें तो किसी भी गुणवत्तापूर्ण CC सड़क के लिए M-20 ग्रेड (1 भाग सीमेंट : 1.5 भाग बालू : 3 भाग गिट्टी) और 15 से 20 सेमी मोटाई तय होती है।

लेकिन बेसकीमुड़ा और आसपास के क्षेत्रों में ग्रामीणों का आरोप है कि नियमों को ठेंगा दिखाकर 1 भाग सीमेंट में 5 भाग बालू और 8 भाग गिट्टी का जहरीला मिक्सचर ढोला जा रहा है! मोटाई भी कागजों के एस्टीमेट से आधी - बमुश्किल 7 से 10 सेंटीमीटर - रखी जा रही है। यह सीधा-सीधा डकैती जैसा मामला है, जहाँ घटिया मसाला डालकर पूरी राशि डकारने का खेल जारी है।

CEO और RES विभाग खामोश : 'कमीशन' का खुला खेल? - स्थानीय ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों का सीधा आरोप है कि जनपद पंचायत लैलूंगा में पदस्थ मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) और ग्रामीण यांत्रिकी सेवा (RES) के इंजीनियर एसी कमरों से बाहर निकलने का नाम नहीं लेते।

 बड़ा सवाल : क्या सब कुछ जानते हुए भी अफसरों ने आंखें मूंद रखी हैं? या फिर 'कट-मनी' और कमीशन के फिक्स रेट के कारण ठेकेदारों और एजेंसियों को खुली छूट मिली हुई है?

नियमित निरीक्षण न होना और घटिया निर्माण के बावजूद भुगतान पास हो जाना इस बात का पुख्ता सबूत है कि यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि सोची-समझी वित्तीय अनियमितता है।

आक्रोशित ग्रामीणों की मांग : 'कागजी विकास' की हो उच्च स्तरीय जांच - लैलूंगा के ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों में इस लूट को लेकर भारी रोष है। उन्होंने जिला प्रशासन से मांग की है कि :

 तकनीकी व वित्तीय जांच : ग्राम जामबाहर, सागरपाली, बेसकीमुड़ा सहित लैलूंगा जनपद की सभी हालिया निर्माण संरचनाओं की निष्पक्ष 'थर्ड पार्टी' जांच कराई जाए।

 सख्त कार्रवाई : गुणवत्ता से खिलवाड़ करने वाली निर्माण एजेंसियों, दोषी इंजीनियरों और मूकदर्शक बने जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज कर कड़ी कार्रवाई हो।

रिकवरी और पुनर्निर्माण : बर्बाद हुए कार्यों की भरपाई दोषी अफसरों व एजेंसियों से कराकर निर्माण कार्य दोबारा मानक स्तर पर कराया जाए।

संपादकीय टिप्पणी : यदि जिला प्रशासन ने जल्द ही इस महा-घोटाले पर कड़ा संज्ञान नहीं लिया, तो लैलूंगा में सरकारी खजाने की यह लूट ऐसे ही जारी रहेगी और सरकार का 'सुशासन' सिर्फ विज्ञापनों तक ही सीमित रह जाएगा।

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