छत्तीसगढ़ में आस्था की रोशनी, 1.50 करोड़ दीयों से जगमगाया प्रदेश!

 

 रायपुर। लोकतंत्र के नए अध्याय में यह स्वर्णिम अक्षरों से दर्ज किया जाएगा कि जब जनता की जेब खाली हो और सिर पर पक्की छत का अकाल हो, तब सबसे मुफीद इलाज होता है - बाजार से थोक के भाव तेल खरीदना, रुई की बत्ती ऐंठना और व्यवस्था की जय-जयकार में आग लगा देना। 17 सितम्बर की शाम छत्तीसगढ़ ने दिखा दिया कि जब 'सुशासन' का बुखार चढ़ता है, तो किस तरह सवा तीन लाख लीटर तेल चंद मिनटों में फूंककर अपनी ही बदहाली पर ताली पीटी जाती है।

राजधानी से लेकर बस्तर के बीहड़ों और सरगुजा की पहाड़ियों तक ऐसा समां रचा गया मानो डेढ़ करोड़ मिट्टी के दीयों से फूटने वाली लौ सीधे राशन कार्ड, खस्ताहाल सड़कों और चरमराते अस्पतालों की बीमारी को भस्म कर देगी। हर नुक्कड़, हर चौराहे पर ढोल-नगाड़ों की थाप पर यह ऐलान हो रहा था कि प्रदेश में खुशहाली इतनी बढ़ चुकी है कि अब लोगों के पास अपने आंसू पोंछने का समय नहीं है, वे सरकारी आदेश के पालन में माचिस की तीलियां सुलगाने में व्यस्त हैं।

धुएं का अर्थशास्त्र : 10 करोड़ स्वाहा, 700 आशियाने कुर्बान - आइए, जनसंपर्क विभाग के चमकीले चश्मे को उतारकर उस बेरहम तराजू पर नजर डालें, जिसे अर्थशास्त्र कहते हैं :

 डेढ़ करोड़ दीयों की सीधी आहुति : मिट्टी का अदना-सा दीया आज बाजार में डेढ़ रुपये से कम नहीं मिलता। यानी ₹2.25 करोड़ सीधे मिट्टी में मिल गए।

 सवा तीन लाख लीटर तेल का हवन : एक सामान्य दीये को बुझने से पहले कम से कम 20 से 25 मिलीलीटर तेल की खुराक चाहिए। डेढ़ करोड़ दीयों का मतलब हुआ लगभग 3.5 लाख लीटर तेल। ₹110 से ₹120 प्रति लीटर के हिसाब से करीब ₹3.75 से ₹4 करोड़ का खाद्य तेल हवा में जहरीला धुआं बनकर विलीन हो गया।

 बाती, माचिस और पसीना : 50 लाख रुपये की रुई और माचिस का हिसाब तो कोई मुनीम भी नहीं जोड़ेगा।

 इवेंट-मैनेजमेंट का शाही तड़का : टेंट, जनरेटर, हाई-मास्ट लाइटें, 4K ड्रोन कैमरे, वीआईपी मंच, बड़े-बड़े होर्डिंग्स और अफसरों की गाड़ियों की आवाजाही का खर्च जोड़ लें, तो इस एक शाम के जलसे का कुल बजट बड़ी सहजता से ₹8 से ₹10 करोड़ की दहलीज पार कर जाता है।

अब जरा उस गरीब की झोपड़ी में झांकिए, जो पिछले तीन साल से प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) की सूची में अपना नाम ढूंढते-ढूंढते मोतियाबिंद का शिकार हो चुका है। ग्रामीण आवास योजना में एक पक्के मकान के लिए सरकार बमुश्किल ₹1.20 लाख से ₹1.30 लाख की इमदाद देती है - वह भी तीन किश्तों में, दर्जनों कागजी जांचों और पटवारी-सचिव की चौखट नापने के बाद।

सीधा हिसाब यह है कि कल शाम जिस ₹10 करोड़ को 'आशीर्वाद' का नाम देकर राख किया गया, उतने में कम से कम 700 से 800 बेघर परिवारों के सिर पर सीमेंट और कंक्रीट की मजबूत छत ढल सकती थी। 700 परिवार पूरी जिंदगी उस छत के नीचे बारिश और आंधी से बचते।

मगर नीति-निर्माताओं का गणित बिल्कुल साफ है- 700 गरीबों को मकान दे देने से सिर्फ 700 परिवार दुआएं देते, उसमें ड्रोन शॉट कहां से लाते? सोशल मीडिया पर ट्रेंड कैसे कराते? रील्स का बैकग्राउंड म्यूजिक किस पर सेट करते? मकान तो खामोश खड़ा रहता है साहब, वह न एक्स पर ट्रेंड करता है और न ही शाम के प्राइम टाइम पर चमकता है। इवेंट तो आग, तेल और धुएं से ही बनता है!

जनभागीदारी’ का चाबुक : तेल आपका, छत हमारी मर्जी की - इस तमाशे का सबसे क्रूर और धारदार पहलू था इसे दिया गया ‘जनभागीदारी’ का नाम। सरकारी तंत्र की चतुराई की दाद देनी होगी। उन्होंने जनता से कहा - "तेल भी तुम खरीदो, दीया भी तुम लाओ, घुटनों के बल बैठकर चौराहों पर बत्ती भी तुम जलाओ, और जब रोशनी हो जाए, तो ताली बजाकर कहो कि राजा कितना दयालु है!"

कतार में खड़ा वही व्यक्ति भी ₹50 की थैली से तेल उंडेल रहा था, जिसके घर की दीवार पिछले महीने की बारिश में ढह गई थी। वह अपने ही हाथों से उस पैसे को जला रहा था, जिससे वह अपने बच्चे की कॉपी-किताबें खरीद सकता था या टपकती छत पर एक नई प्लास्टिक की पन्नी बांध सकता था। लेकिन सम्मोहन का आलम यह था कि उसे यकीन दिला दिया गया कि जब तक चौराहे पर तेल नहीं जलेगा, तब तक उसके जीवन का अंधेरा दूर नहीं होगा।

अंधेरे आशियानों पर सुशासन का ढोल - अभियान अभी थमा नहीं है; यह 'सेवा संकल्प' पूरे एक महीने तक नागरिकों की चेतना को इसी तरह मथता रहेगा। संदेश बहुत तीखा और स्पष्ट है - नागरिकों को बुनियादी हक मांगने की आदत छोड़ देनी चाहिए। जब-जब अस्पताल में बेड कम पड़ें, ताली बजा दीजिए। जब-जब राशन महंगा हो, थाली पीट लीजिए। और जब सिर पर छत न हो, तो घर से बाहर निकलकर सरकारी जयकारे के साथ डेढ़ करोड़ दीये जला दीजिए।

जिन 700 परिवारों की छतें कल शाम के धुएं में उड़ गईं, उन्हें मायूस होने की जरूरत नहीं है। उनके पास पक्का मकान भले न हो, पर उनके जिले के कलेक्टर की रिपोर्ट में यह शानदार आंकड़ा दर्ज हो चुका है कि उनके इलाके ने 'आशीर्वाद' देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। छत से पानी टपके तो टपकने दीजिए, कम से कम मुल्क में यह भ्रम तो जगमगा रहा है कि हम विश्वगुरु बनने की राह पर तेल की नदियां बहा रहे हैं!

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