भारतमाला सड़क! करोड़ों की सड़क में दिखीं दरारें, सिसरिंगा घाट में पहाड़ भी दे रहा खतरे का संकेत

 


धरमजयगढ़ - उरगा से पत्थलगांव को जोड़ने वाली महत्वाकांक्षी भारतमाला परियोजना के तहत बन रही एनएच-130 ए सड़क धरमजयगढ़ क्षेत्र में निर्माण की गुणवत्ता को लेकर सवालों के घेरे में आती नजर आ रही है। सड़क निर्माण का काम अभी पूरी तरह पूरा भी नहीं हुआ है, लेकिन चिकटवानी से सिसरिंगा घाट के बीच सड़क के कुछ हिस्सों में दरारें दिखाई देने लगी हैं। करोड़ों रुपये की लागत से तैयार हो रही सड़क में निर्माण पूरा होने से पहले ही दरारों का उभरना सड़क की मजबूती और निर्माण प्रक्रिया की गुणवत्ता को लेकर गंभीर चिंता पैदा कर रहा है।

मौके की तस्वीरें और सामने आ रही स्थिति यह सवाल खड़ा कर रही है कि जब सड़क अभी निर्माणाधीन है, तब उसमें दरारें आने की वजह क्या है? क्या सड़क की आधार परत, जल निकासी, मिट्टी की पकड़ और निर्माण सामग्री की गुणवत्ता निर्धारित तकनीकी मानकों के अनुरूप है? अथवा बारिश और पहाड़ी भू-भाग की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए निर्माण के दौरान पर्याप्त तकनीकी सावधानी नहीं बरती गई?

पहाड़ काटकर बनाई सड़क, बारिश ने खोली दूसरी तस्वीर

सिसरिंगा घाट क्षेत्र में स्थिति और भी संवेदनशील दिखाई दे रही है। पहाड़ को काटकर बनाई जा रही सड़क के किनारे बारिश के दौरान मिट्टी, पेड़ों और बड़े पत्थरों के खिसकने की स्थिति सामने आ रही है। पहाड़ी सड़क निर्माण में ढलान की स्थिरता, पानी की निकासी, सुरक्षा दीवार, रिटेनिंग स्ट्रक्चर और भूस्खलन रोकने के वैज्ञानिक उपाय बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं। ऐसे में सड़क के आसपास मलबा और मिट्टी खिसकने की स्थिति ने परियोजना की दीर्घकालिक सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पहाड़ की कटिंग के बाद ढलानों को स्थिर रखने के लिए पर्याप्त और मजबूत इंतजाम किए गए हैं? बारिश के मौसम में यदि अभी से मिट्टी और पत्थरों का खिसकना शुरू हो रहा है, तो आने वाले वर्षों में भारी बारिश के दौरान इस सड़क की स्थिति क्या होगी, यह भी गंभीर विषय है।

दरारें सिर्फ सड़क पर नहीं, गुणवत्ता के दावों पर भी

भारत माला जैसी बड़ी सड़क परियोजना का उद्देश्य केवल सड़क का निर्माण करना नहीं, बल्कि लंबे समय तक सुरक्षित और टिकाऊ परिवहन व्यवस्था तैयार करना है। ऐसे में निर्माण पूरा होने से पहले सड़क की सतह पर दिखाई देने वाली दरारें सामान्य मानकर नजरअंदाज नहीं की जा सकतीं। दरारों का कारण केवल सतही समस्या है या इसके पीछे सड़क की आधार संरचना से जुड़ी कोई तकनीकी कमी है, इसका परीक्षण जरूरी है।

डीबीएल कंपनी द्वारा कराए जा रहे निर्माण कार्य को लेकर अब स्थानीय स्तर पर यह मांग उठना स्वाभाविक है कि संबंधित विभाग और परियोजना की गुणवत्ता जांच से जुड़े अधिकारी मौके का तकनीकी निरीक्षण करें। सड़क की मोटाई, आधार परत, प्रयुक्त सामग्री, गुणवत्ता परीक्षण रिपोर्ट, जल निकासी व्यवस्था, पहाड़ी कटिंग और ढलान स्थिरीकरण जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं की जांच की जाए।

सड़क बनने से पहले ही मरम्मत की नौबत तो नहीं?

सबसे गंभीर चिंता यह है कि यदि निर्माणाधीन सड़क में अभी से दरारें विकसित हो रही हैं, तो क्या आगे चलकर इन्हीं स्थानों पर सड़क को बार-बार मरम्मत की जरूरत पड़ेगी? यदि ऐसा होता है तो परियोजना की लागत के साथ-साथ आम लोगों की सुरक्षा और सड़क की उपयोगिता पर भी असर पड़ सकता है।

इस पूरे मामले में निर्माण एजेंसी की तकनीकी जिम्मेदारी, गुणवत्ता नियंत्रण की प्रक्रिया और संबंधित अधिकारियों द्वारा किए गए निरीक्षण की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। जरूरत इस बात की है कि सड़क के प्रभावित हिस्सों का स्वतंत्र तकनीकी परीक्षण कराया जाए और यदि किसी स्तर पर निर्माण मानकों में कमी पाई जाती है तो जिम्मेदारी तय की जाए।

फिलहाल चिकटवानी से सिसरिंगा घाट तक सामने आ रही दरारें और पहाड़ी ढलानों से खिसकती मिट्टी-पत्थर भारतमाला सड़क की मजबूती पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहे हैं। करोड़ों रुपये की इस परियोजना में सड़क कितनी मजबूत, सुरक्षित और टिकाऊ बन रही है, इसका जवाब अब मौके की तस्वीरें ही नहीं बल्कि इसके साथ निष्पक्ष तकनीकी जांच और गुणवत्ता परीक्षण दे सकता है। 

Post a Comment

Previous Post Next Post