जशपुर में 'जंगलराज': कोर्ट के स्टे ऑर्डर को जूते की नोक पर रखते भू-माफिया, दूसरे की निजी जमीन पर सीनाजोरी से अवैध निर्माण...



जशपुर। जिले के बागबहार क्षेत्र में कानून व्यवस्था और न्यायपालिका के इकबाल पर गहरा संकट खड़ा हो गया है। यहाँ एक रसूखदार गठजोड़ द्वारा न केवल एक व्यक्ति की निजी भूमि पर अवैध कब्जा किया जा रहा है, बल्कि माननीय न्यायालय के आदेशों को भी 'ठेंगा' दिखाया जा रहा है। तहसीलदार न्यायालय द्वारा दो साल के भीतर दो बार सख्त स्थगन आदेश जारी किए जाने के बाद भी मौके पर निर्माण कार्य का न रुकना यह साबित करता है कि यहाँ कानून का नहीं, बल्कि 'भू-माफियाओं' का राज चल रहा है।

दो साल, दो स्टे, पर निर्माण बेरोकटोक...दस्तावेजों की पड़ताल से साफ होता है कि यह विवाद कोई नया नहीं है, बल्कि सोची-समझी साजिश के तहत जमीन हड़पने का मामला है:



2024 की अवमानना: सबसे पहले 12 जनवरी 2024 को तहसीलदार न्यायालय बागबहार ने आदेश क्रमांक 851 के जरिए निर्माण कार्य को तत्काल रोकने और पुलिस को स्थल जांच के निर्देश दिए थे।

2026 की ताजा चुनौती: आश्चर्य की बात यह है कि दो साल बाद भी जब अनावेदकों (धनीराम और जेठुराम) के हौसले पस्त नहीं हुए, तो न्यायालय को कल यानी 12 जनवरी 2026 को दोबारा स्थगन आदेश (आदेश क्रमांक 917) जारी करना पड़ा।

मौके की हकीकत: न्यायालय ने पुलिस और पटवारी को कड़ी चेतावनी के साथ रिपोर्ट मांगी है, लेकिन धरातल पर कंक्रीट का ढांचा खड़ा किया जा चुका है, जो सीधे तौर पर न्यायालय की अवमानना (Contempt of Court) है।

RTI के जवाब ने उड़ाई व्यवस्था की धज्जियां - इस पूरे खेल में प्रशासन की भूमिका संदिग्ध नजर आती है। जब पीड़ित पक्ष ने सूचना के अधिकार (RTI) के तहत  जानकारी मांगी तो "जनपद पंचायत पत्थलगांव का यह जवाब सीधे तौर पर भ्रष्टाचार को संरक्षण देने जैसा है, जहाँ मुख्य कार्यपालन अधिकारी ने यह स्वीकार किया है कि धनीराम यादव और जेठू यादव को प्रधानमंत्री आवास की स्वीकृति बिना किसी नक्शा, खसरा, बी-1 या शपथ पत्र के ही दे दी गई। 'रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं' होने का तर्क देकर विभाग अपनी जवाबदेही से पल्ला झाड़ रहा है, जो स्पष्ट करता है कि बिना मालिकाना हक की पुष्टि किए अवैध निर्माण के लिए सरकारी धन की बंदरबांट की गई है और यह पूरी प्रक्रिया गहरी प्रशासनिक साठगांठ का परिणाम है।"

तस्वीरें दे रही गवाही : सरिया खड़ा है, कानून बेबस है - संलग्न तस्वीरों में स्पष्ट देखा जा सकता है कि न्यायालय के स्थगन आदेश की धज्जियां उड़ाते हुए मौके पर पिलर और कॉलम खड़े कर दिए गए हैं। जिस जमीन (खसरा नं. 11/1, 11/2) के राजस्व रिकॉर्ड आवेदक उमेश अग्रवाल के नाम पर दर्ज हैं, वहां दूसरे लोग अवैध रूप से ईंट-गारा चढ़ा रहे हैं और स्थानीय प्रशासन 'कुंभकर्णी नींद' में सोया हुआ है।

जनता के तीखे सवाल :

क्या जशपुर में कोई भी व्यक्ति किसी की भी निजी जमीन पर कब्जा कर निर्माण शुरू कर सकता है?

तहसीलदार के दो-दो आदेशों के बाद भी पुलिस और राजस्व अमला मौके पर काम बंद करवाने में क्यों हिचकिचा रहा है?

क्या प्रशासन इन भू-माफियाओं के खिलाफ FIR दर्ज कर उन्हें जेल भेजेगा या मामला फाइलों में ही दफन हो जाएगा?

यह मामला केवल एक जमीन विवाद नहीं, बल्कि न्यायपालिका की साख पर हमला है। अगर प्रशासन ने इस 'अवैध सीनाजोरी' पर तत्काल हथौड़ा नहीं चलाया, तो आम आदमी का कानून पर से भरोसा उठ जाएगा। कोतबा-बागबहार की जनता अब इस गुंडागर्दी के खिलाफ आर-पार की लड़ाई के मूड में है।

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