पत्थलगांव, जशपुर। केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) के क्रियान्वयन को लेकर पत्थलगांव नगर पंचायत क्षेत्र में असंतोष बढ़ता जा रहा है। कई पात्र हितग्राहियों का आरोप है कि आवास स्वीकृति और प्रक्रिया पूरी कराने के लिए वे वर्षों से कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन अब तक उन्हें योजना का लाभ नहीं मिल सका है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्होंने निर्धारित प्रक्रिया के तहत आवेदन जमा किए, आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत किए और बार-बार अधिकारियों से संपर्क भी किया, लेकिन उनकी फाइलें आगे नहीं बढ़ रही हैं। इससे गरीब और जरूरतमंद परिवारों में निराशा का माहौल है, जो अपने पक्के घर के सपने को पूरा करने के लिए सरकारी योजनाओं पर निर्भर हैं।
रिश्वतखोरी के आरोप, निष्पक्ष जांच की मांग
क्षेत्र में यह चर्चा भी तेज है कि कुछ मामलों में बिना "सुविधा शुल्क" दिए कार्य आगे नहीं बढ़ता। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन लगातार सामने आ रही शिकायतों ने नगर पंचायत की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। नागरिकों ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।
मुख्यमंत्री के गृह जिले में व्यवस्था पर सवाल
जशपुर जिला मुख्यमंत्री का गृह क्षेत्र होने के कारण लोगों की अपेक्षाएं प्रशासन से और अधिक हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री आवास जैसी महत्वपूर्ण योजना के लाभ से पात्र परिवारों का वंचित रहना कई सवाल खड़े कर रहा है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि समय पर निगरानी और जवाबदेही तय होती, तो गरीबों को इस तरह परेशान नहीं होना पड़ता।
जनता का आरोप—दफ्तरों के चक्कर, समाधान नहीं
हितग्राहियों के अनुसार वे बार-बार नगर पंचायत कार्यालय पहुंचकर अपने आवेदन की स्थिति जानने का प्रयास करते हैं, लेकिन उन्हें स्पष्ट जवाब नहीं मिलता। कई लोगों का आरोप है कि महीनों और वर्षों से उनकी फाइलें लंबित हैं, जिससे योजना का उद्देश्य प्रभावित हो रहा है।
जांच और कार्रवाई की मांग
क्षेत्र के नागरिकों और जनप्रतिनिधियों ने मांग की है कि प्रधानमंत्री आवास योजना के लंबित मामलों की समीक्षा कर वास्तविक स्थिति सार्वजनिक की जाए। साथ ही यदि कहीं अनियमितता, लापरवाही या भ्रष्टाचार पाया जाता है तो संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों पर कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए, ताकि पात्र गरीब परिवारों को जल्द से जल्द आवास योजना का लाभ मिल सके।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रशासन इन शिकायतों को गंभीरता से लेकर पारदर्शी जांच करेगा, या फिर गरीबों के पक्के मकान का सपना फाइलों में ही कैद रह जाएगा?
