विभागीय आदेशों की उड़ी धज्जियां, 'बधिर' हुए जिम्मेदार विश्वस्त सूत्रों और प्राप्त जानकारियों के अनुसार, बीते साल 2 नवंबर 2025 को सूबे के शिक्षा मंत्री ने एक कड़ा और ऐतिहासिक आदेश जारी किया था। इस आदेश के तहत प्रदेश में चल रहे सभी प्रकार के संलग्नीकरण (अटैचमेंट) को तत्काल प्रभाव से समाप्त कर, सभी शिक्षकों और कर्मचारियों को उनके मूल पदस्थापना स्थल पर भेजने के निर्देश दिए गए थे।हैरानी की बात यह है कि इस कड़े फरमान के महीनों बाद भी जिला शिक्षा अधिकारियों (DEO) और विकासखंड शिक्षा अधिकारियों (BEO) के कान में जूं तक नहीं रेंगी है।
धरातल पर स्थिति जस की तस बनी हुई है। न तो किसी को मूल स्थान पर भेजा गया, न इस संबंध में कोई समीक्षा की गई और न ही आदेश की अवहेलना करने वालों पर कोई दंडात्मक कार्रवाई हुई।
मुख्यमंत्री के गृह जिले में सबसे बुरा हाल, अपात्रों की 'मौज'सूत्रों का दावा है कि इस कुशासन का सबसे वीभत्स रूप मुख्यमंत्री के गृह जिले में देखने को मिल रहा है। वहां नियम-कानूनों को ताक पर रखकर अपात्र और चहेते कर्मचारी बड़े-बड़े और मलाईदार पदों पर विराजमान हैं। जब कमान ही अपात्रों के हाथ में हो, तो शासन के आदेशों का पालन कौन सुनिश्चित कराएगा?इतना ही नहीं, राजधानी रायपुर समेत प्रदेश के कई रसूखदार जिलों में शिक्षा विभाग के कर्मचारी अपनी मनमानी और ऊंची साठगांठ के दम पर दूसरे विभागों में मलाईदार कुर्सियों पर अटैच होकर बैठे हैं।
'धृतराष्ट्र' बने बैठे हैं आला अधिकारी इस पूरे मामले में सबसे विवादित पहलू उन विभागों के बड़े अधिकारियों का रवैया है, जहां ये कर्मचारी अवैध रूप से संलग्न हैं। ये आला अफसर आंखें होते हुए भी 'धृतराष्ट्र' की भूमिका में आ गए हैं। उन्हें न तो सरकार के आदेशों की परवाह है और न ही व्यवस्था की। इन अधिकारियों और कर्मचारियों का रवैया ऐसा है मानो शासन उनका खुद का हो और वे किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के प्रति जवाबदेह नहीं हैं।
साख दांव पर, क्या हंटर चलाएंगे मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री?सरकारी तंत्र की इस बेलगाम मनमानी ने अब सीधे तौर पर मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री की साख को दांव पर लगा दिया है। जनता के बीच यह संदेश जा रहा है कि सरकार का इकबाल खत्म हो चुका है और ब्यूरोक्रेसी बेलगाम है। अब देखना यह होगा कि सुशासन का दम भरने वाले सूबे के मुखिया और शिक्षा मंत्री इन लापरवाह अधिकारियों और मलाईदार कुर्सियों से चिपके कर्मचारियों पर कब और क्या दंडात्मक हंटर चलाते हैं, या फिर यह 'कुशासन' यूं ही फलता-फूलता रहेगा।

