शिक्षक का वास्तविक परिचय उसके पदनाम से नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के प्रति उसके समर्पण और सेवा भावना से होता है। यही संदेश देते हुए शिक्षाविद् डॉ. उमेश कुमार दुबे ने कहा कि शिक्षा का दान संसार का सबसे श्रेष्ठ दान है और प्रत्येक शिक्षक का पहला दायित्व हर बच्चे तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुँचाना है।उन्होंने कहा कि शिक्षा व्यवस्था में प्राथमिक, उच्च प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च माध्यमिक जैसे अलग-अलग स्तर निर्धारित किए गए हैं। नई शिक्षा नीति 2020 ने भी इन्हें व्यवस्थित रूप से परिभाषित किया है, लेकिन इन सभी का अंतिम उद्देश्य केवल एक है—हर विद्यार्थी को बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराना।डॉ. दुबे ने कहा कि अक्सर प्राथमिक शिक्षक आवश्यकता पड़ने पर उच्च कक्षाओं को पढ़ाने के लिए तैयार हो जाते हैं, लेकिन कई बार उच्च कक्षाओं के शिक्षक प्राथमिक बच्चों को पढ़ाने से यह कहकर पीछे हट जाते हैं कि यह उनका स्तर नहीं है। ऐसे में यह आत्ममंथन करने की आवश्यकता है कि हमारी पहचान पद से है या शिक्षक होने से उन्होंने कहा कि प्राथमिक कक्षाएँ शिक्षा की नींव होती हैं। यदि शुरुआती शिक्षा मजबूत होगी, तो विद्यार्थियों का भविष्य भी मजबूत बनेगा। इसलिए किसी भी शिक्षक को छोटे-बड़े पद के भेदभाव से ऊपर उठकर बच्चों के हित में कार्य करना चाहिए उन्होंने यह भी कहा कि जब कोई व्याख्याता, प्रधान पाठक या वरिष्ठ शिक्षक प्राथमिक विद्यालय के बच्चों के बीच बैठकर उन्हें पढ़ाता है, तो उसका सम्मान कम नहीं होता, बल्कि समाज में उसकी प्रतिष्ठा और बढ़ जाती है। यही एक सच्चे शिक्षक का आदर्श स्वरूप है।डॉ. उमेश कुमार दुबे ने सभी शिक्षकों से आह्वान किया कि वे अपने पद से पहले अपने शिक्षक होने के दायित्व को समझें और जहाँ भी बच्चों को शिक्षा की आवश्यकता हो, वहाँ पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ अपनी भूमिका निभाएँ उन्होंने कहा कि शिक्षक का सबसे बड़ा सम्मान उसके पद में नहीं, बल्कि उसके समर्पण, सेवा और विद्यार्थियों के जीवन में लाए गए सकारात्मक बदलाव में निहित होता है
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जिला जांजगीर चंपा