पत्थलगांव | अगर आप अपनी जमीन की रजिस्ट्री कराने, बच्चे का जाति-निवास प्रमाण पत्र बनवाने या किसी जरूरी राजस्व काम से पत्थलगांव तहसील कार्यालय जाने की सोच रहे हैं, तो जरा रुकिए! जेब से किराया खर्च करने से पहले यह जान लीजिए कि मैडम तहसीलदार साहिबा कार्यालय में नहीं, बल्कि 'विशेष अवकाश श्रृंखला' पर हैं।
जनता परेशान है, दूर-दराज के गांवों से आकर धूप और धूल फांक रही है, लेकिन प्रशासनिक संवेदनहीनता का आलम यह है कि साहब को जनता के वक्त और किराए-भाड़े से ज्यादा प्यार अपनी छुट्टियों से है!
09 से 16 तक 'ट्रेलर', अब 27 से 10 तक पूरी 'फिल्म'!
सूत्रों और कार्यालयीन गलियारों की चर्चाओं पर यकीन करें तो पत्थलगांव तहसील कार्यालय में पदस्थ तहसीलदार श्रीमती जयश्री राजनपथे का 'मनमानी मॉडल' इन दिनों सिर चढ़कर बोल रहा है।
पहला अध्याय: हाल ही में 09 तारीख से 16 तारीख तक मैडम कार्यालय से नदारद रहीं। जनता आस लगाए बैठी रही, फाइलें धूल फांकती रहीं और प्रशासनिक कार्य पूरी तरह ठप पड़ा रहा।
दूसरा अध्याय: अभी जनता उस सदमे से उबरी भी नहीं थी कि खबर आ गई—27 तारीख से 10 तारीख तक साहिबा फिर से लंबी छुट्टी पर पधार चुकी हैं!
सवाल यह है कि क्या तहसील कार्यालय किसी अधिकारी की व्यक्तिगत सहूलियत से चलेगा या आम जनता की सहूलियत से?
प्रभार देने में परहेज? अतिरिक्त तहसीलदार का क्या काम फिर!
सबसे मजेदार और हास्यास्पद पहलू तो यह है कि तहसील कार्यालय में अतिरिक्त तहसीलदार की मौजूदगी के बावजूद उन्हें विधिवत प्रभार (Charge) सौंपने की जहमत तक नहीं उठाई गई।
बड़ा सवाल: जब एक जिम्मेदार अधिकारी छुट्टी पर जाता है, तो जनता के काम न रुकें इसलिए प्रभार सौंपा जाता है। लेकिन मैडम का यह 'बिना प्रभार दिए रफूचक्कर होने' का रवैया किस प्रशासनिक नियमावली में आता है? क्या अतिरिक्त तहसीलदार सिर्फ कुर्सी सजाने के लिए हैं या फिर प्रभार न देने के पीछे कोई 'विशेष' गणित काम कर रहा है?
जनता की किस्मत में सिर्फ "निराशा और किराया"
दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों से आने वाले किसान, मजदूर और छात्र रोज उम्मीद की किरण लेकर तहसील पहुंचते हैं। कोई रजिस्ट्री का टोकन लेकर बैठा है, तो किसी छात्र का भविष्य जाति-निवास प्रमाण पत्र न बनने के कारण अधर में लटका है। लेकिन दफ्तर पहुंचते ही उन्हें एक ही रटा-रटाया जवाब मिलता है—"साहब छुट्टी पर हैं, बाद में आना!"
सरकारी तंत्र का यह बेपरवाह रवैया साफ बयां करता है कि आम जनता की समस्याओं से आला अधिकारियों को कोई सरोकार नहीं रह गया है।
क्या कलेक्टर महोदय लेंगे संज्ञान?
जब एक जिम्मेदार पद पर बैठा अधिकारी जनता की समस्याओं को ताक पर रखकर अपनी मनमर्जी से छुट्टियां मनाएगा और प्रभार देने तक की औपचारिकता पूरी नहीं करेगा, तो फिर 'सुशासन' का दावा हवा-हवाई ही नजर आएगा।
अब देखना यह है कि जशपुर जिले के उच्च प्रशासनिक अधिकारी और कलेक्टर महोदय इस मनमानी का संज्ञान लेते हैं या फिर पत्थलगांव की जनता ऐसे ही "तहसीलदार साहिबा की छुट्टियों" का इंतजार करने को मजबूर रहेगी!

