कागजों का 'जादू': जिस विवादित जमीन पर पटवारी नापा गया, उसी की धड़ाधड़ हो गई रजिस्ट्री!

 


पत्थलगांव / जशपुर:

कहते हैं कि प्रशासनिक व्यवस्था में नियम-कानून आम जनता के लिए होते हैं, लेकिन जब 'मेहरबानी' बरसती है तो नामुमकिन भी मुमकिन हो जाता है। जशपुर जिले में राजस्व का एक ऐसा ही अनोखा खेल सामने आया है, जिसे देखकर कानून के जानकार भी अपना सिर पकड़ लें!

मामला खसरा नंबर 333/1 की उसी चर्चित और विवादित जमीन का है, जिसके चक्कर में कुछ समय पहले ही पूर्व पटवारी मदन भगत को गाज गिरी थी और उन्हें बर्खास्त (सेवामुक्त) कर दिया गया था। जिस जमीन की कालिख से एक पटवारी की नौकरी स्वाहा हो गई, उसी 'अंगार' वाली जमीन पर साहबों ने ऐसा हाथ साफ किया कि एक-दो नहीं, बल्कि रजिस्ट्री का पूरा मेला ही लगा दिया!


🎭 9 से 13 तारीख का 'सुपरसोनिक' खेल: 5 दिन में 33 रजिस्ट्रियां!

साहबों की कार्यशैली की दाद देनी पड़ेगी। 9 से 13 तारीख के बीच राजस्व विभाग में ऐसी 'बुलेट ट्रेन' दौड़ी कि महज 5 दिनों के भीतर 33 रजिस्ट्रियां निपट गईं!

इसमें 4 हक त्याग के मामले भी शामिल हैं।

ताज्जुब की बात यह है कि जिन नामों के आगे 'खास निशान' लगे हैं, वे उसी विवादित भू-खंड (333/1) से जुड़े बताए जा रहे हैं।

सवाल यह उठ रहा है कि जिस जमीन की फाइल में 'विवाद' की मुहर लगी थी, वह अचानक इतनी पाक-साफ कैसे हो गई कि पूर्व तहसीलदार प्रांजल मिश्रा जी ने एक के बाद एक रजिस्ट्रियों की झड़ी लगा दी?

💼 'ऊपर' तक तार जुड़े होने की चर्चाएँ तेज

स्थानीय गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म है कि इतना बड़ा काम बिना 'बड़े हाथ' के आशीर्वाद के संभव ही नहीं है। आम जनमानस और प्रबुद्ध वर्ग खुलकर सवाल उठा रहे हैं कि क्या इस पूरे मामले में उच्च अधिकारियों और कमिश्नर स्तर की भी मौन सहमति या मिलीभगत है?

"जिस आग में पटवारी जलकर खाक हो गया, उसी आग पर बड़े साहब अपनी रोटियां सेक गए—वाह रे प्रशासनिक व्यवस्था!"

जनता के चुभते सवाल:

पटवारी दोषी तो अधिकारी बेदाग कैसे? अगर खसरा नंबर 333/1 में फर्जीवाड़ा था और पटवारी बर्खास्त हुआ, तो उसी खसरे पर रजिस्ट्री करने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई की सुई क्यों नहीं घूमती?

क्या तबादले के आदेश सिर्फ कागजी रस्म थे? (संलग्न आदेश क्रमांक 416 के तहत प्रांजल मिश्रा जी को बगीचा स्थानांतरित कर कार्यमुक्त किया गया था)। कार्य मुक्ति के इस दौर में इतनी आनन-फानन में रजिस्ट्रियों का 'टारगेट' कैसे पूरा हुआ?

कमिश्नर साहब की खामोशी का राज क्या है? क्या इस पूरे रैकेट की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच होगी या फिर यह मामला भी ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?

अब देखना यह होगा कि इस 'रजिस्ट्री कांड' का जिन्न बाहर आने के बाद जिला प्रशासन और शासन स्तर से क्या सख्त कदम उठाए जाते हैं, या फिर यह विवादित जमीन ऐसे ही 'साहबों की मेहरबानी' का जरिया बनी रहेगी।


Post a Comment

Previous Post Next Post