लैलूंगा (रायगढ़):
जहाँ बच्चों को इंसानियत और संस्कार का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए, वहाँ 'लैलूंगा का सेंट माइकल इंग्लिश मीडियम स्कूल' जुल्म और गुंडागर्दी का नया अखाड़ा बन चुका है! 21 अगस्त 2026 की सुबह 11:30 बजे, स्कूल परिसर में एक ऐसा खौफनाक मंजर देखने को मिला, जिसे सुनकर किसी भी संवेदनशील इंसान की रूह कांप जाए।
सातवीं कक्षा (Class 7rd) में पढ़ने वाले महज 13 वर्षीय मासूम छात्र का कसूर सिर्फ इतना था कि वह स्कूल के वॉशरूम (शौचालय) की तरफ चला गया। फिर क्या था, वहाँ पहले से घात लगाए बैठे आठवीं कक्षा के सीनियर 'साहबों' ने मासूम को घेर लिया।
गालियाँ, रैगिंग और जानलेवा हमला:
वॉशरूम में सजाई 'यातना गृह' की महफ़िल
पूर्व नियोजित साजिश के तहत इस 13 साल के अबोध बच्चे का जबरन रास्ता रोका गया, भद्दी-भद्दी गालियाँ दी गईं और रैगिंग के नाम पर दरिंदगी की सारी हदों को पार कर दिया गया। जब मासूम ने विरोध किया, तो इन दबंग छात्रों ने एकराय होकर उस पर जानलेवा हमला बोल दिया।
बर्बरता की हद तो तब हो गई जब बच्चे की आँख के पास और चेहरे पर गंभीर चोटें आईं। बीच-बचाव करने पहुँचे सहपाठियों को भी इन बाहुबली छात्रों ने नहीं बख्शा और उनके साथ भी जमकर मारपीट व आहत किया।
"मुँह खोला तो जान से मार देंगे!"
वारदात को अंजाम देने के बाद इन मनचले सीनियरों ने पीड़ित बच्चों को खुलेआम धमकी दी कि "अगर इस बारे में स्कूल प्रबंधन या घर में किसी को बताया, तो जान से मार डालेंगे!" 13 साल का मासूम भयानक मानसिक आघात और गहरे सदमे में है कि उसके स्वास्थ्य और जीवन पर गंभीर संकट बन आया है।
तंत्र का 'मौन व्रत' और कागज़ी घोड़ों की दौड़:
पीड़ित बच्चे के पिता धुपेंद्र कुमार पंडा (निवासी- बुराईडीह, लैलूंगा) ने न्याय के लिए थाना प्रभारी लैलूंगा और विकासखंड शिक्षा अधिकारी (BEO) लैलूंगा के दरवाजे खटखटाए हैं और लिखित शिकायत दर्ज कराई है। लेकिन हमारे पुलिस और शिक्षा विभाग की 'रफ्तार' के क्या कहने!
स्कूल प्रबंधन की 'अंधी भक्ति':
स्कूल परिसर के वॉशरूम में 13 साल के बच्चे को बेरहमी से पीटा जाता है, और स्कूल प्रशासन को भनक तक नहीं लगती? क्या स्कूल केवल मोटी फीस वसूलने के लिए खोले गए हैं, बच्चों की सुरक्षा का जिम्मा क्या राम भरोसे है?
शिक्षा विभाग की 'कछुआ चाल': शिकायत की कॉपी पर सील-ठप्पा तो लग गया, लेकिन क्या आरोपियों के खिलाफ त्वरित और कठोर दंडात्मक कार्रवाई होगी या एंटी-रैगिंग नियमों की फाइलें दफ्तरों की धूल चाटती रहेंगी?
कानूनी धाराएँ या महज औपचारिकता?: भारतीय न्याय संहिता (BNS), एंटी-रैगिंग नियमों और किशोर न्याय अधिनियम के तहत सख्त FIR की मांग की गई है। अब देखना यह है कि कानून के हाथ इन बाल-अपराधियों और लापरवाही बरतने वाले प्रबंधन तक कब पहुँचते हैं!
अगर स्कूलों में ही 13 साल के बच्चों को जान से मारने की धमकियाँ और हैवानियत झेलनी पड़े, तो अभिभावक अपने बच्चों को विद्या अर्जन के लिए भेजें या आत्मरक्षा की ट्रेनिंग के लिए? प्रशासन को जगने के लिए आखिर और कितने मासूमों के खून बहने का इंतज़ार है?

