पत्थलगांव –24 अगस्त, सोमवार को जहाँ किलकिला मंदिर की ओर बढ़ता हर कदम आस्था का प्रतीक था, वहीं स्थानीय शासन और प्रशासन की आँखें शायद 'विशेष वीआईपी सेवा' के मोह में मूंद ली गईं। लाखों की भीड़, तपती सड़क, धक्के खाते आम श्रद्धालु और उनके बीच से सीना चीरती हुई लक्जरी गाड़ियाँ—यह नज़ारा किसी धार्मिक स्थल का कम, और 'पूंजीवादी अकड़' के नुमाइश का अड्डा ज़्यादा लग रहा था।
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जब मंदिर मार्ग पर एक इंच पैदल चलना भी किसी युद्ध को जीतने जैसा था, तब कुछ तथाकथित पूंजीपति आम भक्तों को 'कीड़ा-मकोड़ा' समझकर अपनी बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ सीधे मंदिर के मुहाने तक घसीट लाए। लेकिन असली सवाल इन 'रसूखदारों' से भी ज़्यादा उस पंगु प्रशासन से है, जो तमाशबीन बनकर सब देखता रहा।
*आस्था बनाम रसूख* भीषण गर्मी और भारी भीड़ में आम श्रद्धालु जान जोखिम में डालकर दर्शन के लिए तरस रहे थे, जबकि बड़ी गाड़ियों का काफिला उनके बीच से ऐसे गुजरा मानो रास्ते में इंसान नहीं, गाड़ियों के टायर के नीचे आने वाले कीड़े-मकोड़े खड़े हों।
*प्रशासनिक नाकामी की इंतहा:* सुरक्षा का ढिंढोरा पीटने वाली पुलिस और जिम्मेदार प्रशासन की खामोशी किस बात का इशारा करती है? क्या मंदिर के नियम-कानून सिर्फ नंगे पैर चलने वाले आम भक्तों के लिए हैं? या फिर पूंजीपतियों के हॉर्न की आवाज़ के आगे खाकी का विसल (सीटी) बजना बंद हो जाता है?
*हादसे को खुला न्यौता:* ऐसी भीड़ में गाड़ियों की आवाजाही किसी भी पल बड़े हादसे या भगदड़ की वजह बन सकती थी। लेकिन ऐसा लगता है कि व्यवस्था संभालने वालों को किसी बड़े हादसे की तारीख का इंतज़ार है, तभी तो आँखें मूँदकर वीआईपी कल्चर को हरी झंडी दिखाई गई।
यदि कानून और व्यवस्था की लाठी सिर्फ आम जनता की पीठ तोड़ने के लिए है, तो प्रशासन को मंदिर के प्रवेश द्वार पर एक बड़ा बोर्ड टांग देना चाहिए—"यहाँ आस्था का कोई मोल नहीं, प्रवेश सिर्फ गाड़ियों के ब्रांड और बैंक बैलेंस देखकर मिलेगा।"
लाखों भक्तों की सुरक्षा को ताक पर रखकर पूंजीपतियों को शह देना न केवल प्रशासनिक नाकामी है, बल्कि यह सीधे-सीधे सत्ता और रसूख की साठगांठ की ओर इशारा करता है।
*जनता अब सीधा जवाब मांग रही है कि आखिर किसके इशारे पर श्रद्धालुओं की आस्था को इन भारी-भरकम गाड़ियों के नीचे कुचला गया?*

