बलरामपुर-रामानुजगंज / वाड्रफनगर:
कहते हैं कानून अंधा होता है, पर वाड्रफनगर थाने में तो कानून के रखवाले ही जैसे अपनी बौद्धिक चरागाह में खोए नजर आ रहे हैं। मामला महज़ ₹599 की अवैध कटौती और ठगी का है, लेकिन चौकी के कर्ता धर्ताओं ने इसे ऐसा राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बना दिया है कि पीड़ित से ही पूछा जा रहा है— "बोलिए, कौन सा केस बनाएं?"
वाह रे खाकी! जनता की सेवा का जिम्मा उठाने वाली पुलिस अब लगता है खुद ही 'DIY (Do It Yourself)' यानी 'अपना केस खुद बनाओ' योजना पर काम कर रही है।
तीन महीने से एड़ी-चोटी का जोर, पर *FINDI BANKIT* कंपनी मस्त, पुलिस पस्त!
कहानी शुरू होती है गांधी पटेल नाम के एक सीधे-साधे नागरिक से, जिनकी जेब से 'Findi Bankit' कंपनी ने 17 जुलाई 2026 को बिना पूछे ₹599 का सब्सक्रिप्शन शुल्क साफ कर लिया। भाई साहब ने कंपनी के नुमाइंदों—शोएब खान, महफूज अली, विजय श्रीवास्तव से लेकर नोडल अधिकारी विनोद पुंडीर तक—सबके दरवाजे खटखटा डाले। उधर से मिला सिर्फ एक ही रटा-रटाया जवाब या तो ठेंगा, या फिर "I'll call you later" का टरकाऊ संदेश। थक हारकर जब पीड़ित न्याय की आस में खाकी की शरण में पहुंचा, तो थाने के साहबान ने ऐसा नायाब जुमला फेंका कि पीड़ित का खून खौल उठा।
कप्तान साहब, आपके जिले में चल क्या रहा है?
जनता पूछ रही है कि क्या छत्तीसगढ़ के इस कोने में पुलिस महकमा सिर्फ गरीबों का खून चूसने और फॉर्म की औपचारिकता पूरी करने के लिए बैठा है? जब थाने के नुमाइंदों को यही नहीं पता कि 599 रुपये की डिजिटल ठगी पर कौन सी धारा लगेगी, तो फिर जनता अपनी फरियाद लेकर कहां जाए? क्या थानों में अब वकीलों की तरह 'केस डिजाइनिंग काउंटर' खुलने वाले हैं, जहां पीड़ित खुद अपनी धाराएं तय करके लाएगा?
सवाल यह है कि ₹599 का यह छोटा सा दिखने वाला फ्रॉड यदि एक बड़े रैकेट का हिस्सा है, तो पुलिस इसे ठिठोली में क्यों उड़ा रही है? क्या 'Findi Bankit' के नुमाइंदे इतने ताकतवर हो चुके हैं कि वे खुलेआम कह रहे हैं— "जो करना है कर लो, कंपनी का कुछ नहीं बिगाड़ पाओगे", और हमारी पुलिस कहती है— "जाओ, खुद ही तय करो क्या धारा लगाएं!"
अब देखना यह है कि इस व्यवस्था पर सवाल खड़े करती इस खबर के बाद क्या जिला प्रशासन और कप्तान साहब की नींद खुलेगी, या वाड्रफनगर थाने के बाबू लोग अभी भी जनता से पूछते रहेंगे— "बताओ भाई, अर्जी पर कौन सी धारा का तड़का लगाएं?"
