पत्थलगांव (जशपुर)। पत्थलगांव राजस्व विभाग एक बार फिर विवादों के घेरे में है। ताजा मामला रसूखदारों के प्रभाव में नियमों को ताक पर रखकर जमीन की रजिस्ट्री करने का है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, जिस भूमि का प्रकरण राजस्व मंडल (Board of Revenue) बिलासपुर में विचाराधीन है, उसकी रजिस्ट्री पूर्व तहसीलदार प्रांजल मिश्रा द्वारा किए जाने का सनसनीखेज मामला सामने आया है।
क्या है पूरा मामला?
यह विवाद जमीन के मालिकाना हक को लेकर है। बताया जा रहा है कि पूर्व में आकांक्षा त्रिपाठी द्वारा उक्त भूमि को पूर्व भूमि स्वामी 'गम्भीर दास' के नाम पर दर्ज करने का आदेश दिया गया था। इस निर्णय के खिलाफ आवेदक सुरेश यादव ने विभिन्न स्तरों पर गुहार लगाई। जब मामला संभाग आयुक्त के न्यायालय से भी खारिज हो गया और सुरेश यादव को वहां से कोई राहत नहीं मिली, तब उनके द्वारा वकील के माध्यम से राजस्व मंडल बिलासपुर में अपील दायर की गई, जहाँ मामला वर्तमान में 'विचाराधीन' है।
नकल ने खोली पोल: आदेश की कॉपी गायब हैरानी की बात तब सामने आई जब मामले की नकल निकाली गई।
नकल में अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) पत्थलगांव के आदेश में संभाग आयुक्त के किसी आदेश का उल्लेख तो किया गया है, लेकिन रिकॉर्ड के साथ उस आदेश की मूल प्रति (Copy) संलग्न नहीं है।
नियमानुसार, यदि कोई मामला वरिष्ठ न्यायालय में लंबित हो, तो उस पर किसी भी प्रकार का हस्तांतरण या रजिस्ट्री प्रतिबंधित होती है।
प्रशासनिक मिलीभगत की आशंका?
क्षेत्र में चर्चा है कि राजस्व विभाग के अधिकारियों ने जानबूझकर तथ्यों को छुपाया। सवाल यह उठता है कि:यदि मामला राजस्व मंडल में लंबित है, तो तहसीलदार द्वारा रजिस्ट्री की अनुमति कैसे दी गई?बिना किसी स्पष्ट आदेश के सुरेश यादव के नाम पर जमीन की रजिस्ट्री किस आधार पर हुई?
क्या रसूखदारों के दबाव में आकर नियमों की अनदेखी की गई?
शंका के घेरे में 'रसूखदारों की खनक'आरोप लग रहे हैं कि पत्थलगांव राजस्व विभाग में रसूखदारों के सिक्कों की खनक के आगे कानून बौना साबित हो रहा है। जानकारों का कहना है कि यदि राजस्व मंडल से मामले का निराकरण हो गया होता, तो अनुविभागीय अधिकारी और पूर्व तहसीलदार प्रांजल मिश्रा ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से उसका उल्लेख किया होता।
आदेश का उल्लेख न होना और विचाराधीन भूमि की रजिस्ट्री होना सीधे तौर पर प्रक्रियात्मक गड़बड़ी और भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है। नियम
⚖️ मामले के मुख्य बिंदुविचाराधीन मामला
(Sub-judice): यदि कोई प्रकरण राजस्व मंडल बिलासपुर में लंबित है, तो उस संपत्ति की यथास्थिति (Status Quo) बनी रहनी चाहिए। बिना अंतिम आदेश के रजिस्ट्री करना कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण हो सकता है।
आदेशों का अभाव: अनुविभागीय अधिकारी (SDM) पत्थलगांव द्वारा अपने आदेश में जिस संभागीय आयुक्त के आदेश का उल्लेख किया गया है, उसका नकल में न पाया जाना एक दस्तावेजी विसंगति है।
नाम परिवर्तन का आधार: यदि पूर्व में आकांक्षा त्रिपाठी द्वारा जमीन को 'गम्भीर दास' के नाम पर दर्ज करने का आदेश दिया गया था, तो बिना किसी वरिष्ठ न्यायालय के स्पष्ट विपरीत आदेश के 'सुरेश यादव' के नाम पर रजिस्ट्री और नामांतरण की प्रक्रिया संदिग्ध है।संभावित कानूनी उल्लंघन राजस्व संहिता का उल्लंघन: छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता के अनुसार, जब मामला उच्च न्यायालय या राजस्व मंडल में लंबित हो, तो निचली अदालतों को उस पर ऐसा कोई निर्णय नहीं लेना चाहिए जो मामले की प्रकृति बदल दे।दस्तावेजी हेरफेर: फाइल से महत्वपूर्ण आदेश की कॉपी का गायब होना प्रशासनिक कदाचार (Administrative Misconduct) की श्रेणी में आता है।
रजिस्ट्री प्रक्रिया: बिना वैध स्वामित्व प्रमाण या न्यायालय के स्पष्ट आदेश के रजिस्ट्री करना पंजीयन नियमों के विरुद्ध है।
भाग 2 जल्द बड़ा खुलासा इसी मामले को ले कर पिक्चर अभी बाकी है