भाग 2
जशपुर। छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता के प्रावधानों और पुराने राजस्व आदेशों की वैधता को लेकर जशपुर कलेक्टर न्यायालय से एक महत्वपूर्ण फैसला सामने आया है। न्यायालय ने साल 1957 में हुए एक भूमि नामांतरण के मामले में सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया है कि भू-राजस्व संहिता 1959 के लागू होने से पहले के आदेशों पर इस संहिता के तहत विचार करना तकनीकी रूप से जटिल है।क्या है पूरा मामला?
यह मामला पत्थलगांव तहसील के ग्राम ससकोबा की भूमि (खसरा नंबर 331/1) से जुड़ा है। साल 1957 में नायब तहसीलदार द्वारा इस ज़मीन का नामांतरण आदेश पारित किया गया था। इस पुराने आदेश को चुनौती देते हुए कलेक्टर न्यायालय में अपील दायर की गई थी। अपीलकर्ता का मुख्य तर्क यह था कि 1956 में निष्पादित एक विक्रय पत्र (Sale Deed) के आधार पर बिना उचित सूचना और इश्तहार प्रकाशन के यह नामांतरण कर दिया गया था।
न्यायालय का फैसला और तकनीकी आधारकलेक्टर न्यायालय ने मामले की गहराई से समीक्षा करते हुए निम्नलिखित प्रमुख बिंदु रखे:
अधिकार क्षेत्र का अभाव:
न्यायालय ने पाया कि विवादित आदेश 20 सितंबर 1957 का है, जबकि वर्तमान छत्तीसगढ़ (तत्कालीन मप्र) भू-राजस्व संहिता 2 अक्टूबर 1959 से प्रभावी हुई थी। कानून के अनुसार, संहिता लागू होने से पहले के आदेशों पर धारा 44(1) के तहत अपील सुनने का अधिकार इस न्यायालय को नहीं है।
पुनरावलोकन (Review) की संभावना:
हालांकि अपील को तकनीकी आधार पर खारिज किया गया, लेकिन न्यायालय ने 'धारा 51' का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि यदि किसी राजस्व अधिकारी को लगता है कि उनके या उनके पूर्ववर्ती के आदेश में त्रुटि है, तो वे उसका पुनरावलोकन कर सकते हैं।
आदेश रद्द: न्यायालय ने पूर्व में जून 2024 में पारित एक अंतरिम आदेश को निरस्त करते हुए, मामले को उचित कानूनी प्रक्रिया के लिए पुनर्जीवित करने का संकेत दिया है।
महत्व यह आदेश उन लोगों के लिए एक नजीर है जो दशकों पुराने ज़मीनी विवादों को सुलझाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। यह स्पष्ट करता है कि राजस्व मामलों में समय सीमा और सही धाराओं का चुनाव कितना महत्वपूर्ण है। अब इस मामले की अगली सुनवाई नियमानुसार जशपुर कलेक्टर के समक्ष धारा 51 के तहत होगी।
भाग 3 अभी बाकी है धीरे धीरे खुलासा होगा


