*छाल तहसील में एक ही जमीन पर दो विरोधाभासी नामांतरण आदेश, राजस्व न्यायालय की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल*


धरमजयगढ़ - रायगढ़ जिले के छाल तहसील क्षेत्र में राजस्व न्यायालय के एक मामले ने प्रशासनिक पारदर्शिता और राजस्व प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्राम सिंगीझाप स्थित खसरा नंबर 90/2/ज, रकबा 1.2140 हेक्टेयर भूमि के नामांतरण मामले में कुछ ही महीनों के अंतराल में दो ऐसे आदेश सामने आए हैं, जिनमें एक ही भूमि को लेकर परस्पर विरोधी निर्णय दिखाई देते हैं। खास बात यह है कि पहले नामांतरण आवेदन को शासकीय आबंटन की भूमि बताते हुए खारिज किया गया था, जबकि बाद में उसी भूमि का नामांतरण क्रेता के पक्ष में कर दिया गया।

उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, उक्त भूमि के संबंध में पूर्व में छाल तहसील न्यायालय के समक्ष नामांतरण का आवेदन प्रस्तुत किया गया था। उस समय राजस्व न्यायालय ने भूमि की प्रकृति का उल्लेख करते हुए इसे शासकीय आबंटन से प्राप्त भूमि माना था। आदेश में यह भी आधार बनाया गया था कि ऐसी भूमि के हस्तांतरण के लिए नियमानुसार सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति आवश्यक है। चूंकि संबंधित अनुमति प्रस्तुत नहीं की गई थी, इसलिए नामांतरण आवेदन को स्वीकार नहीं किया गया और उसे खारिज कर दिया गया।

मामले में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न इसके बाद सामने आता है। जानकारी के मुताबिक, पूर्व आदेश के विरुद्ध किसी सक्षम उच्च राजस्व न्यायालय में अपील अथवा पुनरीक्षण के माध्यम से उसे निरस्त या परिवर्तित कराए जाने का कोई स्पष्ट रिकॉर्ड सामने नहीं आया है। इसके बावजूद कुछ महीनों बाद उसी भूमि, उसी खसरा नंबर और उसी रकबे को लेकर दोबारा नामांतरण की कार्यवाही हुई और इस बार निर्णय पूर्व आदेश से पूरी तरह अलग रहा।

बाद के नामांतरण आदेश के आधार पर उक्त भूमि राजस्व अभिलेखों में क्रेता हर्ष पटेल, पिता टीका राम के नाम दर्ज हो गई। यही वह बिंदु है जिसने पूरे मामले को संदेह के घेरे में ला दिया है। सवाल यह है कि जब पूर्व में इसी भूमि को शासकीय आबंटन की भूमि मानते हुए नामांतरण से इनकार किया गया था, तो बाद की कार्यवाही में भूमि की प्रकृति और पूर्व आदेश का क्या परीक्षण किया गया? यदि पूर्व आदेश प्रभावी था तो उसके रहते नया नामांतरण किस आधार पर स्वीकार किया गया?

पूर्व आदेश का उल्लेख न होना भी बना जांच का विषय

मामले को और गंभीर बनाने वाली बात यह है कि बाद में जारी नामांतरण आदेश में पूर्व में इसी भूमि के नामांतरण आवेदन के खारिज होने का उल्लेख दिखाई नहीं देता। यदि पूर्व आदेश वास्तव में राजस्व अभिलेखों का हिस्सा था, तो बाद की कार्यवाही में उसका संज्ञान लिया जाना स्वाभाविक था।

राजस्व मामलों के जानकारों के अनुसार, किसी भूमि से संबंधित पूर्व न्यायिक अथवा अर्द्धन्यायिक आदेश की अनदेखी कर उसी विषय पर बाद में विपरीत निर्णय दिए जाने की स्थिति में पूरे प्रकरण की प्रक्रिया, दस्तावेजों और आदेशों की वैधानिकता की जांच आवश्यक हो जाती है। हालांकि, इस मामले में अंतिम रूप से किसी अधिकारी या व्यक्ति को दोषी ठहराने से पहले मूल अभिलेखों, नामांतरण प्रकरणों, बिक्री दस्तावेजों और संबंधित अनुमति पत्रों की स्वतंत्र जांच जरूरी होगी।

शासकीय आबंटन की भूमि होने पर अनुमति का सवाल अहम

पूरे मामले में सबसे अहम बिंदु भूमि की वास्तविक प्रकृति है। यदि पूर्व आदेश में दर्ज अनुसार खसरा नंबर 90/2/ज की भूमि वास्तव में शासकीय आबंटन या पट्टे के माध्यम से प्राप्त भूमि थी, तो उसके हस्तांतरण और नामांतरण से जुड़े प्रतिबंधों तथा सक्षम प्राधिकारी की अनुमति की स्थिति स्पष्ट करना आवश्यक है।

ऐसे में यह भी जांच का विषय बनता है कि बाद में नामांतरण के दौरान क्या भूमि के मूल आबंटन संबंधी दस्तावेजों का परीक्षण किया गया था? क्या सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति प्रस्तुत की गई थी? यदि अनुमति थी तो वह किस तारीख को और किस आधार पर जारी हुई? और यदि अनुमति नहीं थी तो पूर्व में खारिज किए गए नामांतरण के विपरीत बाद में नामांतरण किस वैधानिक आधार पर स्वीकृत किया गया?

उच्च स्तरीय जांच की उठने लगी मांग

एक ही भूमि को लेकर सामने आए इन दोनों आदेशों के बाद राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना स्वाभाविक है। स्थानीय स्तर पर मांग उठ रही है कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच किसी वरिष्ठ राजस्व अधिकारी से कराई जाए तथा पूर्व और बाद के दोनों नामांतरण प्रकरणों की मूल नस्ती, आदेश पत्र, आवेदन, बिक्री विलेख, भूमि अभिलेख और सक्षम प्राधिकारी की अनुमति सहित सभी दस्तावेजों का मिलान कराया जाए।

यदि जांच में यह प्रमाणित होता है कि पूर्व आदेश को प्रभावी रहते हुए उसकी अनदेखी कर बाद में विपरीत नामांतरण किया गया, अथवा महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाकर राजस्व न्यायालय से आदेश प्राप्त किया गया, तो संबंधित अधिकारियों और पक्षकारों की भूमिका भी जांच के दायरे में आ सकती है।

फिलहाल, खसरा नंबर 90/2/ज की 1.2140 हेक्टेयर भूमि पर पहले नामांतरण से इनकार और बाद में उसी भूमि का नामांतरण स्वीकृत होने के बीच का अंतर ही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल बना हुआ है। अब देखना यह है कि राजस्व विभाग इस विरोधाभास की जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाता है या मामला राजस्व अभिलेखों में दर्ज दो अलग-अलग आदेशों के बीच उलझकर रह जाता है।

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