लैलूंगा अस्पताल का शव वाहन विवादों में, निजी व्यक्ति के घर में खड़े होने के आरोप से मचा हड़कंप गरीबों के लिए शुरू हुई निःशुल्क सुविधा पर उठे गंभीर सवाल, जांच की मांग तेज



लैलूंगा रायगढ़ / लैलूंगा स्थित शासकीय अस्पताल इन दिनों एक गंभीर विवाद को लेकर चर्चाओं में है। मामला अस्पताल के सरकारी शव वाहन से जुड़ा हुआ है, जिसे लेकर क्षेत्र में लगातार सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय लोगों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि अस्पताल का शासकीय शव वाहन अस्पताल परिसर में खड़ा रहने के बजाय एक निजी व्यक्ति अथवा ड्राइवर के घर में रखा जाता है, जबकि संबंधित व्यक्ति सरकारी कर्मचारी भी नहीं बताया जा रहा है। इस पूरे मामले ने स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।

जानकारी के अनुसार शासन द्वारा अस्पतालों में शव वाहन इसलिए उपलब्ध कराए जाते हैं ताकि दुर्घटना, आत्महत्या, हत्या, पोस्टमार्टम अथवा अस्पताल में मृत्यु होने की स्थिति में गरीब एवं जरूरतमंद परिवारों को निःशुल्क सुविधा मिल सके। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में यह सुविधा अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि कई परिवार आर्थिक तंगी के कारण निजी वाहन का खर्च वहन नहीं कर पाते। लेकिन अब आरोप लग रहे हैं कि लैलूंगा अस्पताल का शव वाहन नियमों के अनुरूप अस्पताल परिसर में उपलब्ध नहीं रहता, बल्कि निजी नियंत्रण में संचालित हो रहा है।

स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि जब भी शव वाहन की आवश्यकता पड़ती है, तब कई बार वाहन तत्काल उपलब्ध नहीं हो पाता। लोगों का आरोप है कि वाहन अस्पताल में न रहकर किसी निजी स्थान पर खड़ा रहता है, जिससे आपातकालीन परिस्थितियों में परिजनों को भारी परेशानी झेलनी पड़ती है। कुछ ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि शव वाहन से शव पहुंचाने के बदले राशि मांगे जाने की चर्चाएं लंबे समय से क्षेत्र में सुनाई देती रही हैं। हालांकि इन आरोपों की अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन लगातार सामने आ रही शिकायतों ने पूरे मामले को गंभीर बना दिया है।

क्षेत्रीय सामाजिक संगठनों एवं जागरूक नागरिकों ने सवाल उठाया है कि यदि वाहन शासकीय है तो उसका संचालन, रखरखाव और पार्किंग पूरी तरह अस्पताल प्रशासन की निगरानी में होना चाहिए। ऐसे में यदि वाहन किसी निजी व्यक्ति के घर में रखा जा रहा है तो यह प्रशासनिक लापरवाही ही नहीं बल्कि सरकारी संसाधनों के संभावित दुरुपयोग का मामला भी हो सकता है। लोगों का कहना है कि यह केवल वाहन रखने का मामला नहीं बल्कि शासन की उस संवेदनशील व्यवस्था से जुड़ा प्रश्न है, जो गरीबों और दुखी परिवारों की सहायता के लिए बनाई गई थी।

मामले को लेकर क्षेत्र में धीरे-धीरे आक्रोश बढ़ने लगा है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि किसी दुर्घटना या आकस्मिक मृत्यु के समय वाहन उपलब्ध न हो और परिजनों को घंटों इंतजार करना पड़े, तो यह मानवीय संवेदनाओं के साथ खिलवाड़ माना जाएगा। कई लोगों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और यह स्पष्ट किया जाए कि आखिर किसके आदेश अथवा अनुमति से सरकारी शव वाहन निजी व्यक्ति के नियंत्रण में संचालित हो रहा है।

जानकारों का मानना है कि सरकारी वाहनों को निर्धारित शासकीय परिसर से बाहर निजी उपयोग अथवा निजी नियंत्रण में रखना नियमों के विपरीत माना जाता है। यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित अधिकारियों एवं जिम्मेदार व्यक्तियों पर विभागीय कार्रवाई के साथ वैधानिक कार्यवाही भी संभव हो सकती है। साथ ही वाहन के उपयोग, डीजल खर्च, लॉगबुक और संचालन संबंधी रिकॉर्ड की भी जांच किए जाने की मांग उठ रही है।

इधर आम जनता का कहना है कि सरकार गरीबों के लिए योजनाएं तो बनाती है, लेकिन जमीनी स्तर पर यदि उन्हीं सुविधाओं का सही संचालन न हो तो योजनाओं का उद्देश्य समाप्त हो जाता है। लोगों ने छत्तीसगढ़ स्वास्थ्य विभाग, जिला प्रशासन तथा स्वास्थ्य अधिकारियों से तत्काल हस्तक्षेप कर मामले की उच्च स्तरीय जांच कराने और दोषियों पर सख्त कार्रवाई करने की मांग की है।

अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस गंभीर मामले को कितनी गंभीरता से लेता है और क्या वास्तव में गरीबों के लिए शुरू की गई यह निःशुल्क सुविधा व्यवस्था के दुरुपयोग से बच पाती है या नहीं। फिलहाल पूरे क्षेत्र में यह मामला चर्चा और नाराजगी का विषय बना हुआ है।

क्या कहते है डाक्टर धरम पैंकरा खंड चिकित्सा अधिकारी लैलूंगा 

शव वाहन एक ही है लेकिन इसका संचालन टेंडर वाले करते है उनके माध्यम से ड्राइवर रखा गया है शव वाहन तो अस्पताल में ही रहना चाहिए ड्राइवर अपने घर में रखा है तो ये तो गलत है और पैसे लेन देन की बात मेरे संज्ञान में नहीं आया है मै इस बात को उनके कंपनी वाले को बताता हूं।

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