हादसा होने का ही तो इंतज़ार है जनाब! जशपुर के 'शासकीय कन्या शाला बगडोल' में बदहाली चरम पर, क्या सो रहे हैं जिम्मेदार?

 

विशेष रिपोर्ट | जिला: जशपुर, ग्राम पंचायत: बगडोल (छत्तीसगढ़)

कहते हैं कि बच्चे देश का भविष्य होते हैं, लेकिन जशपुर जिले के ग्राम पंचायत बगडोल में नन्हे-मुन्ने बच्चों का 'भविष्य' एक ऐसी जर्जर इमारत में हर दिन दांव पर लगाया जा रहा है, जिसे अगर 'स्कूल' कहें तो शायद स्कूल शब्द का भी अपमान हो जाए!

जी हाँ, 'शासकीय कन्या शाला बगडोल' की स्थिति आज बद से बदतर हो चुकी है। स्कूल की इमारत को देखकर ऐसा लगता है मानो यह पढ़ाई का मंदिर नहीं, बल्कि किसी बड़े हादसे का भव्य निमंत्रण कार्ड है। लेकिन अफसोस! शायद हमारे जिम्मेदार अधिकारियों और नेताओं का नियम ही यही है—"जब तक कोई लाश न गिरे, तब तक फाइल आगे कैसे बढ़ेगी?"

न स्कूल प्रशासन को फिक्र, न सरपंच साहिब को फुर्सत!

गाँव के सरपंच जी, स्कूल प्रबंधन समिति के सदस्य और स्कूल प्रशासन—सबने मिलकर जैसे चुप्पी की 'मास्टर डिग्री' हासिल कर ली है।

  स्कूल प्रशासन का हाल: शायद गुरुजी लोग इस ताक में हैं कि जब छत गिरेगी, तब देखेंगे। अभी तो जैसे-तैसे दिन कट रहे हैं।

  सरपंच एवं जनप्रतिनिधि: गाँव के विकास के लंबे-चौड़े भाषण देने वाले स्थानीय जनप्रतिनिधियों और सरपंच साहिब के पास इस स्कूल की तरफ देखने की फुर्सत ही नहीं है। वोट मांगने के लिए जो दरवाजे खुलते हैं, वे मासूम बच्चियों की सुरक्षा के नाम पर बंद हो जाते हैं।

"कलेक्टर साहब! जरा अपनी एसी गाड़ी से बाहर भी तो देखिए..."

जशपुर के कलेक्टर साहब से गाँव वाले और नौनिहाल अब हाथ जोड़कर गुहार लगा रहे हैं। साहब! दफ्तरों की फाइलों में सब कुछ 'ऑल ओके' दिख सकता है, लेकिन ज़मीन पर आकर देखिए, बगडोल के इन छोटे-छोटे मासूम बच्चों की जिंदगी के साथ रोज़ खिलवाड़ हो रहा है।

 गाँव वालों का सीधा सवाल:

 "क्या शासन-प्रशासन किसी बड़े हादसे और चीख-पुकार का इंतज़ार कर रहा है? क्या जब तक दो-चार बच्चे मलबे के नीचे न दब जाएँ, तब तक आपकी नींद नहीं खुलेगी?"

व्यवस्था पर करारा व्यंग्य:

  डिजिटल इंडिया में 'एडवेंचर स्कूललिग': यहाँ बच्चों को केवल किताबी ज्ञान नहीं दिया जा रहा, बल्कि जर्जर छत के नीचे बैठकर 'मौत का कुआँ' जैसा एडवेंचर भी सिखाया जा रहा है!

  सुरक्षा व्यवस्था शून्य: अगर छत का प्लास्टर गिर जाए तो इसे बच्चों का 'सौभाग्य' माना जाएगा कि वे बच गए, प्रशासन का 'प्रबंधन' तो बिल्कुल नहीं!

अब तो होश में आइए प्रशासन!

नौनिहालों का भविष्य धुंधला हो रहा है और जान जोखिम में है। ग्रामवासी अब शांत बैठने के मूड में नहीं हैं। अगर समय रहते शासकीय कन्या शाला बगडोल की इमारत और व्यवस्थाओं को नहीं सुधारा गया, तो किसी भी बड़े हादसे की पूरी-की-पूरी जिम्मेदारी सीधे तौर पर जिला प्रशासन, शिक्षा विभाग और स्थानीय सरपंच की होगी।

कलेक्टर साहब! फाइलों से बाहर निकलिए और इस बदहाली पर तुरंत कड़ी कार्रवाई कीजिए, इससे पहले कि बगडोल से कोई रुला देने वाली खबर आए!

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